18 नवंबर 1962…
उस सुबह लद्दाख की कड़वी ठंड किसी और दिन जैसी नहीं थी।
आसमान धुंधला था, हवा तेज़ चल रही थी और तापमान इतना कम कि सांस लेना भी किसी चुनौती से कम नहीं। चुशूल सेक्टर के रेज़ांग ला पास पर, लगभग 17,000 फीट की ऊँचाई पर, 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की C कंपनी ( Charlie Company 13 Kumaon Regiment) अपनी अंतिम रक्षा रेखा पर डटी थी। सामने दुश्मन की भारी फौज थी, जबकि पीछे सिर्फ बर्फ़ और पत्थरों का वीरान इलाका। इन 120 भारतीय जवानों के कमांडर थे मेजर शैतान सिंह।
मेजर शैतान सिंह भाटी का जन्म 1 दिसंबर 1924 को राजस्थान के जोधपुर जिले के बनासर गाँव में हुआ। उनका परिवार सेना की परंपरा वाला था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह भाटी ब्रिटिश काल में एक सम्मानित अधिकारी थे और उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ की उपाधि मिली थी। बचपन से ही शैतान सिंह अनुशासन, निष्ठा और कर्तव्य की सीख लेते हुए बड़े हुए। उन्होंने चोपासनी स्कूल से पढ़ाई की और आगे चलकर सेना को अपना जीवन समर्पित कर दिया।
1949 में मेजर शैतान सिंह जोधपुर स्टेट फोर्स में शामिल हुए और आज़ादी के बाद उनका ट्रांसफर कुमाऊँ रेजिमेंट में हुआ। उन्होंने नागा हिल्स में ऑपरेशनों के दौरान और गोवा मुक्ति अभियान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व और शांत स्वभाव ने उन्हें जवानों के बीच एक प्रेरणादायक कमांडर के रूप में स्थापित कर दिया। लेकिन 1962 का भारत-चीन युद्ध वह परीक्षा थी जिसने उनके साहस, कर्तव्य और नेतृत्व को हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज कर दिया।
रेज़ांग ला पास चुशूल सेक्टर में लगभग 18,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित था। इस ऊंचाई पर ठंड इतनी कठोर थी कि हथियार जम जाते थे और उंगलियां सुन्न हो जाती थीं। भारतीय जवानों के पास सीमित हथियार थे, ऊँचाई के कारण भारतीय तोपों का सहयोग नहीं मिल पा रहा था, कपड़े भी पर्याप्त नहीं थे। इसके मुकाबले चीनी सेना संख्या में बहुत ज्यादा थी और आधुनिक हथियारों से लैस थी। उनका लक्ष्य था चुशूल घाटी पर कब्ज़ा जमाना, और उसके लिए रेज़ांग ला को पार करना जरूरी था। यह पोस्ट गिरती, तो पूरा सेक्टर खतरे में आ जाता।
सुबह करीब 4 बजे जब पहाड़ों पर अभी अंधेरा था, चीनी सेना ने पहला हमला किया। C कंपनी पहले से तैयार थी और पहली लहर को रोक दिया गया। लेकिन यह केवल शुरुआत थी। जल्दी ही दूसरी, तीसरी और फिर कई और लहरें आने लगीं। चीन ने ‘मानव-तरंग’ जैसी रणनीति अपनाई, जिसमें वे एक के बाद एक हज़ारों सैनिक भेज रहे थे ताकि भारतीय जवान थक जाएं या हथियार खत्म हो जाएं।
भारतीय जवानों पर हमले की तीव्रता बढ़ती जा रही थी। गोलियां कम होने लगीं, कई पोस्टों पर हथियारों की कमी हो गई। फिर भी किसी ने पीछे हटने की बात नहीं की। जब राइफलें जवाब देने लगीं, जवानों ने बैयोनट लगाकर और हाथों में जो कुछ मिला उससे लड़ाई जारी रखी।
इस भारी गोलाबारी के बीच मेजर शैतान सिंह एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट पर जाते रहे। वे जवानों की हिम्मत बढ़ाते, हथियारों की स्थिति संभालते और मोर्चे को मजबूत रखते रहे। उनकी उपस्थिति ही जवानों के साहस की सबसे बड़ी ताकत थी। इसी दौरान मेजर शैतान सिंह दुश्मन की गोली से गंभीर रूप से घायल हो गए। जवान उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें खतरा समझ आ गया। उन्होंने आदेश दिया कि वे उन्हें वहीं छोड़ दें और वापस जाकर बता दें कि उनकी कंपनी आखिरी सांस तक लड़ी।
कुछ ही देर बाद उन्होंने वीरगति प्राप्त कर ली।
फरवरी 1963 में एक लद्दाखी चरवाहे ने जब वहां जमे हुए भारतीय जवानों के शरीर देखे, तो दुनिया ने समझा कि रेज़ांग ला पर वास्तव में क्या हुआ था।
बाद में सेना की खोज टीम ने मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर उसी चट्टान के सहारे पाया, जहां उनके साथियों ने उन्हें छोड़ा था। उनके हाथ अब भी हथियार पर थे, जैसे वे अब भी मोर्चा संभाले हों। कई सैनिक अपनी राइफल पकड़े हुए ही मिले। किसी भी बंकर का एक भी हिस्सा बिना क्षति के नहीं था। एक बंकर की ढाल पर 759 गोलियों के निशान मिले, और एक सैनिक को 47 गोलियां लगी थीं।
अनुमान के अनुसार, इस दर्रे को कब्ज़े में लेने की कोशिश में करीब 1300 चीनी सैनिक मारे गए, जबकि 120 भारतीय सैनिकों में से 114 वीरगति को प्राप्त हुए। 2 इंच मोर्टार चलाने वाला सैनिक बम हाथ में लिए ही शहीद हुआ। मेडिकल सहायक के हाथ में इंजेक्शन और पट्टी थी, जो बताते हैं कि वह अंतिम समय तक अपने साथियों का इलाज कर रहा था। हज़ार मोर्टार बमों में से सिर्फ सात बचे थे, बाकी सब दाग दिए गए थे। यह वही युद्ध था जिसमें ‘आखिरी आदमी, आखिरी गोली’ सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि वास्तविकता बन गया।
मेजर शैतान सिंह का शरीर जोधपुर लाया गया और उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। C कंपनी को भी आठ वीर चक्र और चार सेना मेडल मिले। इसके बाद इस कंपनी का नाम “रेज़ांग ला कंपनी” रखा गया। आज रेज़ांग ला में बना स्मारक न सिर्फ इन 120 वीरों का, बल्कि भारतीय साहस और कर्तव्यभावना का प्रतीक बन चुका है।
यह लड़ाई दुनिया को आज भी यह याद दिलाती है कि संसाधन कम हों तो भी हौसला ऊंचा हो तो कोई ताकत भारतीय फौज को मिटा नहीं सकती।
फौजीबीट्स की ओर से मेजर शैतान सिंह और चार्ली कंपनी के सभी शूरवीरों को भावभीनी श्रद्धांजलि, उनके त्याग और पराक्रम को शत-शत नमन।
हर फौजी और हर फौजी परिवार को ऐसे अटूट साहस और बलिदान के लिए सलाम।
जय हिन्द!
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