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Assam Rifles 191st Raising Day: क्यों खास है ये दिन और क्या है इसका इतिहास?

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असम राइफल्स (Assam Rifles) भारत की सबसे पुरानी अर्धसैनिक बलों में से एक है, जिसे अक्सर “Sentinels of the North East” के नाम से जाना जाता है। यह बल न सिर्फ भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा करता है, बल्कि पूर्वोत्तर भारत में शांति और स्थिरता बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। अगर आप डिफेंस सेक्टर को समझना चाहते हैं, तो असम राइफल्स के बारे में जानना बेहद जरूरी हो जाता है।

असम राइफल्स क्या है और इसका काम क्या होता है?

असम राइफल्स एक केंद्रीय अर्धसैनिक बल है, जो प्रशासनिक रूप से गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है, जबकि इसके ऑपरेशनल कार्य भारतीय सेना के नियंत्रण में होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य सीमाओं की सुरक्षा, काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन और आंतरिक सुरक्षा बनाए रखना है। इसके अलावा यह बल दूरदराज इलाकों में रहने वाले लोगों की मदद, मेडिकल सहायता और आपदा के समय राहत कार्यों में भी सक्रिय रहता है।

संक्षेप में समझें तो असम राइफल्स एक ऐसी फोर्स है जो सेना और पुलिस दोनों की भूमिका निभाती है, और यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।

असम राइफल्स का इतिहास कैसे शुरू हुआ?

असम राइफल्स का इतिहास 1835 से शुरू होता है, जब इसे “Cachar Levy” के नाम से स्थापित किया गया था। उस समय इसका मुख्य काम असम के चाय बागानों और आसपास के क्षेत्रों को सुरक्षित रखना था। धीरे-धीरे जैसे ब्रिटिश शासन पूर्वोत्तर भारत में बढ़ा, इस बल की जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं।

समय के साथ इस फोर्स का नाम कई बार बदला गया, जैसे Assam Frontier Police, Assam Military Police और East Bengal & Assam Military Police। आखिरकार 1917 में इसे “Assam Rifles” नाम दिया गया, जो आज तक कायम है।

भारत की आजादी के बाद इस बल को पहले विदेश मंत्रालय के तहत रखा गया, लेकिन 1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद इसका ऑपरेशनल कंट्रोल भारतीय सेना को दे दिया गया। 1965 में इसे औपचारिक रूप से गृह मंत्रालय के अधीन कर दिया गया, जबकि सेना आज भी इसके ऑपरेशन को संभालती है।

असम राइफल्स की भूमिका और जिम्मेदारियां

आज के समय में असम राइफल्स कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाती है। इसका सबसे प्रमुख कार्य भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा करना है। इसके अलावा यह पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद से निपटने, कानून व्यवस्था बनाए रखने और स्थानीय लोगों के साथ समन्वय स्थापित करने का काम करती है।

यह बल आपदा के समय राहत कार्यों में भी आगे रहता है और दूरदराज क्षेत्रों में मेडिकल सहायता, शिक्षा और संचार सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद करता है। यही कारण है कि इसे “Friends of the Hill People” भी कहा जाता है, क्योंकि यह स्थानीय समुदाय के साथ मजबूत संबंध बनाकर काम करता है।

असम राइफल्स की संरचना और ताकत

असम राइफल्स में लगभग 46 बटालियन हैं और इसकी कुल संख्या 65,000 से अधिक कर्मियों की है। इस बल में लगभग 80 प्रतिशत अधिकारी भारतीय सेना से आते हैं, जबकि बाकी अधिकारी असम राइफल्स के अपने कैडर से होते हैं। इसका नेतृत्व डायरेक्टर जनरल (DG Assam Rifles) करते हैं, जिनकी नियुक्ति गृह मंत्रालय द्वारा की जाती है।

युद्ध और ऑपरेशन्स में योगदान

असम राइफल्स ने भारत और दुनिया के कई महत्वपूर्ण युद्धों में योगदान दिया है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इसके सैनिकों ने यूरोप और मिडिल ईस्ट में लड़ाई लड़ी और कई वीरता पुरस्कार हासिल किए। द्वितीय विश्व युद्ध में इस बल ने बर्मा (म्यांमार) क्षेत्र में जापानी सेना के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसके अलावा, चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के बाद असम राइफल्स को सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई। समय-समय पर यह बल अरुणाचल प्रदेश और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में कानून व्यवस्था बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता रहा है।

असम राइफल्स Raising Day कब मनाया जाता है?

असम राइफल्स का Raising Day हर साल 24 मार्च को मनाया जाता है। यह दिन इस बल की स्थापना और इसके गौरवशाली इतिहास को याद करने के लिए मनाया जाता है। इस अवसर पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और बल के योगदान को सम्मानित किया जाता है।

असम राइफल्स में सेवा करना आसान नहीं है। इस बल के जवानों को कठिन पहाड़ी इलाकों, घने जंगलों और दूरदराज क्षेत्रों में तैनात रहना पड़ता है। कई बार उन्हें लंबे समय तक परिवार से दूर रहना पड़ता है और लगातार ऑपरेशनल दबाव में काम करना होता है।

लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद, यह सेवा गर्व और सम्मान से भरी होती है। देश की सुरक्षा और लोगों की मदद करने का जो अवसर मिलता है, वह इसे एक खास और सम्मानजनक करियर बनाता है।

असम राइफल्स के Raising Day के अवसर पर हम इस बल के योगदान को सल्यूट करते हैं!

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