1971 के भारत-पाक युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर एक छोटा-सा चौकी क्षेत्र लौंगेवाला, इतिहास का वह मंच बन गया जहाँ भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी ने असंभव लगनेवाली लड़ाई जीतकर सैन्य इतिहास में अपनी जगह हमेशा के लिए पक्की कर ली।
यह कहानी है 4–5 दिसंबर 1971 की उस रात की, जब 23 पंजाब रेजिमेंट की लगभग 120 सैनिकों की कंपनी ने कई गुना बड़े पाकिस्तानी बख़्तर बंद दस्ते को रोक दिया।
1971 में पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा पर हमला कर भारत का ध्यान पूर्वी मोर्चे से हटाने की कोशिश की। थार का खुला रेगिस्तान टैंकों की गतिविधि के लिए उपयुक्त माना जाता था। पाकिस्तानी योजना थी कि तेज़ी से बढ़ते हुए वे तनोट–लौंगेवाला–जैसलमेर मार्ग पर कब्ज़ा कर लें और 48 घंटे में जैसलमेर तक पहुँच जाएँ।
लौंगेवाला पोस्ट, जो सीमा से करीब 16 किमी अंदर थी, पर तैनात थे 23 पंजाब के जवान, BSF (Border Security Forces) का एक छोटा दस्ता और कुछ जीपों पर लगी 106 मिमी की रिकॉयलेस राइफलें। भारी हथियार, टैंक कुछ भी नहीं। फिर भी इनका आदेश था: यदि हमला हो, तो दुश्मन को रोके रखना, जब तक मदद न पहुँच जाए।
4 दिसंबर की आधी रात भारतीय गश्ती दलों ने सीमा पार हलचल महसूस की।मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने स्थिति की सूचना दी और उन्हें पीछे हटने की अनुमति भी मिली, लेकिन उन्होंने पोस्ट न छोड़ने का फैसला किया।
रेत के ऊँचे टीले उनके पक्ष में थे: संकरी राह, सीमित जगह, और ऊँचाई से मिलता प्राकृतिक संरक्षण। उन्होंने जवानों को तैयार किया और इंतज़ार शुरू हुआ।
रात 12:30 बजे जैसे ही पाकिस्तानी टैंक करीब आए, भारतीय जवानों ने बिल्कुल नज़दीक से निशाना लगाया। पहले कुछ टैंक जल उठे और रास्ता रुक गया। दुश्मन का आगे बढ़ना ठहर गया। कई टैंक ढीली रेत में धँस गए। रेगिस्तान की रात आग की चमक और गोलियों की आवाज़ से भर गई।
रात भर पाकिस्तानी सैनिकों ने बार-बार पैदल ही पोस्ट पर चढ़ाई की, लेकिन ऊँचे टीलों पर जमे भारतीय जवान हर बार उन्हें रोकते रहे। मेजर चांदपुरी मोर्चों के बीच चलते हुए सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे। गोला-बारूद सीमित था, लेकिन हर गोली सोच-समझकर चल रही थी। धीमी और मुश्किल संचार व्यवस्था के बावजूद, सुबह होने से पहले हवाई मदद का संदेश भेजने में सफलता मिली।
लेकिन हालात कठिन थे: संख्या में बहुत कम, हथियार सीमित, और गोला-बारूद कम होता जा रहा था।
सुबह 5 दिसंबर, करीब 7 बजे, भारतीय वायु सेना के हंटर विमान आ पहुँचे। खुले रेगिस्तान में खड़े टैंक और वाहनों को निशाना बनाना उनके लिए आसान था। एक के बाद एक हमलों में टैंक और गाड़ियाँ ध्वस्त होते गए।
पाकिस्तानी दस्ते बिखरने लगे, लेकिन समतल रेगिस्तान में छुपने की कोई जगह नहीं थी। दोपहर तक करीब 40 टैंक और 100 से अधिक वाहन नष्ट या छोड़े जा चुके थे।
भारतीय सैनिक अपनी जगह पर डटे रहे घायल दुश्मन को रोका, इलाके को साफ़ किया और पुष्टि की कि हमला पूरी तरह विफल हो चुका है।
लड़ाई थमने पर मैदान में जली हुई टैंकों की लंबी पंक्ति रह गई। भारतीय सेना के दो सैनिक शहीद हुए। दूसरी ओर पाकिस्तान के सैकड़ों सैनिक मारे गए, भारी उपकरण नष्ट हुए, और उसकी प्रमुख बख़्तर बंद रेजिमेंट लड़ाई में निष्क्रिय हो गई।
इस विफलता ने पाकिस्तान की पश्चिमी रणनीति को झटका दिया। भारतीय मोर्चे मजबूत रहे और सेनापूर्वी मोर्चे, पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति, पर ध्यान केंद्रित कर सकी।
लौंगेवाला ने यह साबित किया कि सही नेतृत्व, सही स्थान और दृढ़ इच्छा शक्ति संख्या के मुकाबले कहीं ज़्यादा ताकतवर होते हैं।
मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को उनकी नेतृत्व क्षमता और अदम्य साहस के लिए महावीर चक्र मिला। कई सैनिकों को वीर चक्र और सेना पदक दिए गए।
वायुसेना के पायलटों को भी वीरता पुरस्कार मिले, क्योंकि बेहद चुनौतीपूर्ण रेगिस्तानी परिस्थितियों में उनके हमलों ने लड़ाई की दिशा बदल दी।
FaujiBeats सलाम करता है लोंगेवाला के युद्ध के हर फौजी को उनके सहस के लिए!
जय हिन्द!
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