हर साल 28 सितंबर को गनर्स डे (Gunners’ Day) मनाया जाता है। यह दिन भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी (Regiment of Artillery) की स्थापना की याद में मनाया जाता है।
28 सितंबर 1827 को 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी (5 Bombay Mountain Battery) की स्थापना हुई थी। इसे भारतीय सेना की आर्टिलरी की ऐतिहासिक शुरुआत से जोड़ा जाता है। समय के साथ यही परंपरा भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के रूप में विकसित हुई।
गनर्स डे 2026 इस यात्रा में एक खास पड़ाव है। इस साल 28 सितंबर को 200वां गनर्स डे मनाया जा रहा है। 1827 से 2026 तक 199 साल पूरे होते हैं, लेकिन 1827 को पहले गनर्स डे के रूप में गिनने पर 2026 200वां गनर्स डे है।
रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी का आदर्श वाक्य है:
“सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल” (Sarvatra Izzat-o-Iqbal)
इसका अर्थ है “हर जगह सम्मान और गौरव” (Everywhere with Honour and Glory)।
आज भारतीय आर्टिलरी केवल पारंपरिक तोपों तक सीमित नहीं है। इसमें आधुनिक गन सिस्टम, रॉकेट सिस्टम, मिसाइल, रडार, निगरानी उपकरण और ड्रोन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है।
आइए जानते हैं रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के इतिहास, युद्धों में इसकी भूमिका, आधुनिक हथियार प्रणालियों और भविष्य की तैयारियों के बारे में।
आर्टिलरी का इतिहास कई सदियों पुराना है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारूद और तोपों के इस्तेमाल के साथ युद्ध में आर्टिलरी की भूमिका विकसित हुई।
भारत में भी तोपों के इस्तेमाल के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। हालांकि, आधुनिक और संगठित भारतीय आर्टिलरी की रेजिमेंटल परंपरा की महत्वपूर्ण शुरुआत 28 सितंबर 1827 से मानी जाती है।
इसी दिन 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी की स्थापना हुई थी। उस समय इसे 8वीं कंपनी ऑफ द गोलंदाज बटालियन, बॉम्बे फुट आर्टिलरी (8th Company of the Golandaz Battalion, Bombay Foot Artillery) के नाम से जाना जाता था।
यह यूनिट बॉम्बे आर्मी (Bombay Army) का हिस्सा थी और पहाड़ी इलाकों में आर्टिलरी सपोर्ट देने के लिए बनाई गई थी।
आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 28 सितंबर 1827 को हुई इस स्थापना की याद में हर साल गनर्स डे मनाया जाता है।
5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी को भारतीय आर्टिलरी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
पहाड़ी इलाकों में आर्टिलरी को तैनात करना और उसे अलग-अलग स्थानों तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी। इसलिए माउंटेन आर्टिलरी (Mountain Artillery) को ऐसे इलाकों के लिए तैयार किया गया था जहां सामान्य भारी तोपों को ले जाना मुश्किल होता था।
समय के साथ आर्टिलरी की तकनीक, संगठन और भूमिका में कई बदलाव हुए। लेकिन सैनिकों को फायर सपोर्ट (Fire Support) देने की इसकी मूल भूमिका आज भी बनी हुई है।
द्वितीय विश्व युद्ध (Second World War) के दौरान भारतीय आर्टिलरी की कई यूनिट्स ने अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में हिस्सा लिया।
भारतीय आर्टिलरी यूनिट्स ने अफ्रीका, मध्य पूर्व, इटली, बर्मा, मलाया और अन्य क्षेत्रों में अभियान में हिस्सा लिया।
इस दौरान भारतीय गनर्स (Gunners) को कई सैन्य सम्मान भी मिले। युद्ध के दौरान भारतीय आर्टिलरी की भूमिका और संगठन में भी महत्वपूर्ण विस्तार हुआ।
1945 में भारतीय आर्टिलरी को उसके योगदान के सम्मान में “रॉयल” (Royal) की उपाधि दी गई। इसे रॉयल रेजिमेंट ऑफ इंडियन आर्टिलरी (Royal Regiment of Indian Artillery) कहा गया।
भारत के गणराज्य बनने के बाद 26 जनवरी 1950 को “रॉयल” की उपाधि हटा दी गई।
1947 में भारत की आजादी के समय भारतीय आर्टिलरी में अलग-अलग प्रकार की यूनिट्स और क्षमताएं मौजूद थीं। विभाजन के बाद आर्टिलरी की यूनिट्स और संसाधनों का भी विभाजन हुआ।
आजादी के बाद भारतीय सेना की आर्टिलरी ने देश के कई महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों और युद्धों में भूमिका निभाई।
जम्मू-कश्मीर के कठिन और ऊंचाई वाले इलाकों में आर्टिलरी यूनिट्स ने भारतीय सैनिकों को फायर सपोर्ट दिया।
पहाड़ी इलाकों में सैनिकों की सहायता करने के लिए आर्टिलरी की क्षमता महत्वपूर्ण रही।
1962 के युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों को ऊंचाई वाले और कठिन इलाकों में ऑपरेशनल चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
इन परिस्थितियों में आर्टिलरी यूनिट्स ने भी अपनी भूमिका निभाई और जमीनी सैनिकों को फायर सपोर्ट दिया।
1965 के युद्ध में भारतीय आर्टिलरी ने विभिन्न मोर्चों पर सेना को फायर सपोर्ट प्रदान किया।
आर्टिलरी का इस्तेमाल दुश्मन की सैन्य स्थिति, हथियारों और महत्वपूर्ण ठिकानों के खिलाफ किया गया।
1971 के युद्ध में भारतीय आर्टिलरी ने पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चों पर भूमिका निभाई।
पूर्वी मोर्चे पर भारतीय सेना के अभियानों में आर्टिलरी फायर सपोर्ट ने जमीनी सैनिकों को सहायता दी। युद्ध के बाद बांग्लादेश का गठन हुआ।
कारगिल युद्ध भारतीय आर्टिलरी के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
कारगिल क्षेत्र के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में तैनात भारतीय सैनिकों को फायर सपोर्ट देने में आर्टिलरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
155 मिलीमीटर बोफोर्स एफएच-77बी (Bofors FH77B) तोपों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया गया। ऊंची चोटियों पर मौजूद लक्ष्यों तक फायर पहुंचाना चुनौतीपूर्ण था और इसके लिए आर्टिलरी की फायरिंग तकनीक और योजना का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
कारगिल युद्ध के दौरान बोफोर्स तोपों का प्रदर्शन भारतीय आर्टिलरी के इतिहास में विशेष रूप से याद किया जाता है।
आर्टिलरी का मुख्य काम जमीनी सैनिकों को दूर से फायर सपोर्ट देना है।
लेकिन आधुनिक आर्टिलरी में केवल तोप से फायर करना ही शामिल नहीं है। किसी लक्ष्य पर प्रभावी फायर के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है।
इनमें शामिल हैं:
इसके लिए आधुनिक आर्टिलरी में रडार (Radar), ड्रोन (Drone), निगरानी प्रणाली (Surveillance System) और टारगेट एक्विजिशन सिस्टम (Target Acquisition System) जैसी तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
भारतीय सेना की आर्टिलरी समय के साथ आधुनिक तकनीक अपना रही है। वर्तमान में अलग-अलग भूमिकाओं के लिए कई प्रकार की गन और रॉकेट प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है।
धनुष 155 मिलीमीटर की स्वदेशी आर्टिलरी गन (Artillery Gun) है। इसे भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है।
यह भारतीय आर्टिलरी में स्वदेशी तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का एक उदाहरण है।
एम777 (M777) एक हल्की 155 मिलीमीटर हॉवित्जर (Howitzer) है।
इसका हल्का वजन इसे ऐसे इलाकों में उपयोगी बनाता है जहां भारी उपकरणों को पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होता है।
के9 वज्र-टी एक 155 मिलीमीटर/52 कैलिबर सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रैक्ड आर्टिलरी सिस्टम (Self-Propelled Tracked Artillery System) है।
यह सिस्टम तेज गतिशीलता और फायरपावर प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया है।
दिसंबर 2024 में रक्षा मंत्रालय ने भारतीय सेना के लिए के9 वज्र-टी की खरीद के लिए लगभग 7,628.70 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे।
पिनाका एक मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम (Multi Barrel Rocket Launcher System) है।
इसका विकास भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक और लंबी दूरी की फायर क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण रहा है।
एटीएजीएस यानी एडवांस्ड टोव्ड आर्टिलरी गन सिस्टम (Advanced Towed Artillery Gun System) 155 मिलीमीटर/52 कैलिबर की स्वदेशी आर्टिलरी गन प्रणाली है।
मार्च 2025 में रक्षा मंत्रालय ने एटीएजीएस और हाई मोबिलिटी 6×6 गन टोइंग व्हीकल्स (High Mobility 6×6 Gun Towing Vehicles) के लिए लगभग 6,900 करोड़ रुपये के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह प्रणाली भारतीय सेना की आर्टिलरी क्षमता को बढ़ाने और पुरानी प्रणालियों को बदलने में मदद करेगी।
भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में महिला अधिकारियों की नियुक्ति एक महत्वपूर्ण बदलाव है।
2023 में भारतीय सेना ने पहली बार महिला अधिकारियों के लिए आर्टिलरी की यूनिट्स के दरवाजे खोले। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, उसी वर्ष 10 महिला अधिकारियों को रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में कमीशन किया गया।
जनवरी 2024 में चार महिला अधिकारियों ने गणतंत्र दिवस परेड में मैकेनाइज्ड कॉलम (Mechanised Column) का नेतृत्व किया। उन्होंने पिनाका मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर और स्वाथी वेपन लोकेटिंग रडार (Swathi Weapon Locating Radar) जैसी प्रणालियों को प्रदर्शित किया।
यह भारतीय सेना में महिलाओं की बढ़ती ऑपरेशनल भागीदारी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी के कई अधिकारियों और सैनिकों को युद्ध और ऑपरेशनल परिस्थितियों में उनकी वीरता और सेवा के लिए विभिन्न सैन्य सम्मान मिले हैं।
इनमें अशोक चक्र (Ashoka Chakra), महावीर चक्र (Maha Vir Chakra), कीर्ति चक्र (Kirti Chakra), वीर चक्र (Vir Chakra) और शौर्य चक्र (Shaurya Chakra) जैसे पुरस्कार शामिल हैं।
इन पुरस्कारों की सूची में अलग-अलग युद्धों और ऑपरेशनल परिस्थितियों में अदम्य साहस दिखाने वाले कई अधिकारी और सैनिक शामिल रहे हैं।
आधुनिक युद्धक्षेत्र में तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में आर्टिलरी का आधुनिकीकरण केवल नई तोपों को शामिल करने तक सीमित नहीं है।
आज सटीकता (Precision), लंबी दूरी की फायरिंग, निगरानी (Surveillance), लक्ष्य पहचान (Target Acquisition), ड्रोन और रियल-टाइम जानकारी जैसी क्षमताएं भी महत्वपूर्ण हैं।
भारतीय सेना की आर्टिलरी में स्वदेशी प्रणालियों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। एटीएजीएस और पिनाका जैसी प्रणालियां इसी दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
आर्टिलरी की भविष्य की क्षमता में गन सिस्टम के साथ रडार, ड्रोन, सेंसर और डिजिटल कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम (Digital Command and Control System) का बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
28 सितंबर 1827 को 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी से शुरू हुई यह ऐतिहासिक यात्रा 2026 में 200वें गनर्स डे तक पहुंच गई है।
इन वर्षों में युद्ध का स्वरूप बदला, तकनीक बदली और हथियार प्रणालियां आधुनिक हुईं। शुरुआती दौर की माउंटेन गन से लेकर आज की 155 मिलीमीटर आर्टिलरी गन, सेल्फ-प्रोपेल्ड सिस्टम, रॉकेट लॉन्चर, रडार और निगरानी तकनीक तक भारतीय आर्टिलरी ने लंबा सफर तय किया है।
लेकिन इस पूरी यात्रा में एक बात लगातार बनी रही है: जमीनी सैनिकों को प्रभावी फायर सपोर्ट देना।
गनर्स डे इस विरासत, सेवा और लगातार बदलती तकनीक को याद करने का अवसर है। 2026 का 200वां गनर्स डे भारतीय आर्टिलरी की इसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
जय हिन्द!
गनर्स डे हर साल 28 सितंबर को मनाया जाता है। यह दिन 28 सितंबर 1827 को 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी की स्थापना की याद में मनाया जाता है।
2026 में 200वां गनर्स डे मनाया जा रहा है। 1827 को पहला गनर्स डे मानने पर 2026 में यह 200वां आयोजन है।
गनर्स डे भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी की ऐतिहासिक यात्रा को याद करने के लिए मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 28 सितंबर 1827 को 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी की स्थापना से जुड़ी है।
रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी की ऐतिहासिक रेजिमेंटल शुरुआत 28 सितंबर 1827 को 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी की स्थापना से मानी जाती है।
इसका आदर्श वाक्य “सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल” (Sarvatra Izzat-o-Iqbal) है। इसका अर्थ “हर जगह सम्मान और गौरव” (Everywhere with Honour and Glory) है।
1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय आर्टिलरी ने ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों को महत्वपूर्ण फायर सपोर्ट दिया। 155 मिलीमीटर बोफोर्स तोपों का भी व्यापक इस्तेमाल हुआ।
भारतीय आर्टिलरी में 155 मिलीमीटर गन सिस्टम, सेल्फ-प्रोपेल्ड आर्टिलरी, मल्टी बैरल रॉकेट लॉन्चर, रडार और निगरानी प्रणालियां शामिल हैं। एटीएजीएस, के9 वज्र-टी, धनुष, एम777 और पिनाका इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
हां। 2023 में महिला अधिकारियों को पहली बार रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी में शामिल किया गया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, उस वर्ष 10 महिला अधिकारियों को इस रेजिमेंट में कमीशन किया गया।
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