अगस्त 1965 में भारतीय सेना ने Operation Bakshi के तहत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित रणनीतिक हाजी पीर पास पर कब्जा कर लिया। यह वही मार्ग था जिसका उपयोग पाकिस्तान समर्थित घुसपैठिए कश्मीर में प्रवेश के लिए करते थे। कठिन मौसम, दुर्गम पहाड़ों और भारी प्रतिरोध के बावजूद भारतीय सैनिकों ने इस ऑपरेशन को सफल बनाया।
बारिश लगातार हो रही थी।
पहाड़ी रास्ते कीचड़ में बदल चुके थे। रात इतनी अंधेरी थी कि कुछ मीटर आगे खड़ा सैनिक भी मुश्किल से दिखाई दे रहा था। पीठ पर हथियार, गोला-बारूद और कई घंटों की थकान लेकर भारतीय सैनिक चुपचाप आगे बढ़ रहे थे।
उनके सामने सिर्फ एक पहाड़ी दर्रा नहीं था।
उनके सामने वह रास्ता था जिसके जरिए पाकिस्तान महीनों से कश्मीर में घुसपैठियों को भेज रहा था।
कुछ घंटों बाद इतिहास बनने वाला था।
28 अगस्त 1965 की सुबह भारतीय सेना ने हाजी पीर पास पर कब्जा कर लिया। यह सिर्फ एक सामरिक जीत नहीं थी, बल्कि 1965 के युद्ध का ऐसा मोड़ था जिसने पूरे संघर्ष का संतुलन बदल दिया।
नक्शे पर देखने पर हाजी पीर पास एक साधारण पहाड़ी दर्रा लग सकता है।
लेकिन सैन्य दृष्टि से यह कश्मीर क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण लोकेशनों में से एक था। यह दर्रा उरी और पुंछ के बीच स्थित है और दशकों से नियंत्रण तथा आवाजाही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
1965 में पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों के लिए यही इलाका सबसे बड़ा infiltration corridor बन चुका था। यदि कोई कश्मीर में गुप्त रूप से प्रवेश करना चाहता, तो हाजी पीर क्षेत्र उसका सबसे सुविधाजनक मार्ग था।
यही कारण था कि भारतीय सेना ने इस क्षेत्र को केवल एक पहाड़ी पोस्ट नहीं, बल्कि पूरी घुसपैठ व्यवस्था की रीढ़ माना।
अगस्त 1965।
पाकिस्तान ने एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की जिसे Operation Gibraltar नाम दिया गया।
योजना यह थी कि बड़ी संख्या में प्रशिक्षित घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर में भेजा जाए। उम्मीद थी कि स्थानीय लोग विद्रोह करेंगे और भारतीय प्रशासन कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग निकली।
कश्मीर के लोगों ने अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। कई स्थानों पर स्थानीय नागरिकों ने भारतीय सुरक्षा बलों को घुसपैठियों की जानकारी तक दी।
Operation Gibraltar तेजी से विफल होने लगा। इसके बाद भारतीय सेना ने फैसला किया कि सिर्फ घुसपैठियों को खदेड़ना काफी नहीं होगा। उन रास्तों को भी बंद करना होगा जिनसे वे आ रहे थे।
और यहीं से शुरू हुई हाजी पीर पास की कहानी।
भारतीय सेना ने हाजी पीर बुल्ज पर कब्जा करने के लिए एक विशेष सैन्य अभियान तैयार किया।
इस अभियान का नाम था Operation Bakshi। योजना सरल थी, लेकिन उसका क्रियान्वयन बेहद कठिन।
दो दिशाओं से हमला कर हाजी पीर क्षेत्र को घेरना था। दुश्मन की मजबूत चौकियों, ऊंचे पहाड़ों और खराब मौसम के बीच भारतीय सैनिकों को लगातार आगे बढ़ना था।
यह ऑपरेशन केवल हथियारों की ताकत नहीं, बल्कि साहस, नेतृत्व और धैर्य की परीक्षा बनने वाला था।
26 अगस्त 1965 की रात।
1 PARA बटालियन ने Ceasefire Line पार की और Sank क्षेत्र की ओर बढ़ना शुरू किया। दुश्मन ने वहां मजबूत बंकर, कांटेदार तार और अच्छी तरह तैयार रक्षा व्यवस्था बना रखी थी।
पहाड़ी ढलानों पर चढ़ाई आसान नहीं थी। लगातार बारिश हो रही थी। जमीन फिसलन भरी थी। दृश्यता बेहद कम थी।
लेकिन भारतीय सैनिक आगे बढ़ते रहे। भारी लड़ाई के बाद Sank पर नियंत्रण स्थापित कर लिया गया।
यहीं से आगे का रास्ता खुला।
युद्ध में कुछ फैसले इतिहास बदल देते हैं। Sank पर सफलता मिलने के बाद Major Ranjit Singh Dayal ने आगे बढ़कर सीधे हाजी पीर पास तक पहुंचने की अनुमति मांगी।
अनुमति मिली।
अब उनके सामने दुश्मन की चौकियां, बारिश, खड़ी चढ़ाई और लंबी दूरी थी। रास्ते में कई बार दुश्मन की फायरिंग हुई। सैनिकों को भारी सामान के साथ कठिन चढ़ाई करनी पड़ी।
कल्पना कीजिए।
भीग चुके कपड़े, ठंडी हवाएं, ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी और हर मोड़ पर छिपे दुश्मन।
फिर भी दल आगे बढ़ता रहा। 28 अगस्त 1965 की सुबह भारतीय सैनिक हाजी पीर पास के निकट पहुंच चुके थे।
सुबह लगभग 10 बजे।
Major Dayal ने दुश्मन को सीधे सामने से उलझाए रखा जबकि अन्य सैनिकों ने पश्चिमी दिशा से चढ़ाई कर flank attack किया। पाकिस्तानी सैनिक इस साहसिक maneuver की उम्मीद नहीं कर रहे थे।
अचानक हुए इस हमले से उनकी रक्षा पंक्ति टूट गई।
कुछ ही समय में हाजी पीर पास भारतीय सेना के नियंत्रण में था।
भारत ने केवल एक पोस्ट नहीं जीती थी।
उसने पाकिस्तान की घुसपैठ की सबसे महत्वपूर्ण राह बंद कर दी थी।
हाजी पीर की लड़ाई केवल एक स्थान तक सीमित नहीं थी।
19 Punjab, 4 Rajput, 2 Sikh, 3 Dogra और अन्य इकाइयों ने आसपास की महत्वपूर्ण चोटियों और चौकियों पर भी लड़ाई लड़ी। Bedori जैसी ऊंची और कठिन पोस्टों पर कब्जा करने के लिए सैनिकों को बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
कई अधिकारियों और जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
आखिरकार 10 सितंबर 1965 तक पूरा हाजी पीर बुल्ज भारतीय नियंत्रण में आ गया।
हाजी पीर पास की जीत के कई रणनीतिक लाभ थे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह जीत बेहद कठिन मौसम और दुर्गम terrain में हासिल की गई थी।
युद्ध समाप्त होने के बाद जनवरी 1966 में भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ।
समझौते के तहत दोनों देशों ने युद्ध के दौरान कब्जे में लिए गए क्षेत्रों को वापस करने पर सहमति जताई। इसी प्रक्रिया में भारत ने हाजी पीर पास भी पाकिस्तान को लौटा दिया।
यह निर्णय आज भी defence circles और strategic experts के बीच बहस का विषय बना रहता है।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि हाजी पीर भारत के नियंत्रण में रहता, तो बाद के दशकों में होने वाली कई घुसपैठ गतिविधियों को और अधिक प्रभावी तरीके से रोका जा सकता था। आज जब Line of Control पर surveillance technology, drones और modern intelligence systems का उपयोग हो रहा है, तब भी हाजी पीर पास का महत्व कम नहीं हुआ है।
यह क्षेत्र आज भी भारत-पाकिस्तान सुरक्षा समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। 1965 की यह लड़ाई हमें याद दिलाती है कि कई बार युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते।
उन्हें जीतने के लिए नेतृत्व, साहस, निर्णय क्षमता और असाधारण धैर्य की आवश्यकता होती है। हाजी पीर की कहानी इन्हीं मूल्यों का जीवंत उदाहरण है।
इस ऑपरेशन में असाधारण नेतृत्व और साहस दिखाने के लिए:
1965 की हाजी पीर लड़ाई सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं थी। यह उन सैनिकों की कहानी है जिन्होंने बारिश, अंधेरे, ऊंचाई और दुश्मन की गोलियों के बीच आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने सिर्फ एक दर्रा नहीं जीता, बल्कि उस समय भारत की सुरक्षा रणनीति को नई दिशा दी।
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जय हिंद।
हाजी पीर पास पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में पीर पंजाल पर्वतमाला के क्षेत्र में स्थित एक महत्वपूर्ण पर्वतीय दर्रा है।
यह लड़ाई 26 से 28 अगस्त 1965 के बीच भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लड़ी गई थी।
Operation Bakshi भारतीय सेना का वह सैन्य अभियान था जिसका उद्देश्य हाजी पीर पास और आसपास के क्षेत्र पर कब्जा करना था।
वे भारतीय सेना के अधिकारी थे जिन्होंने हाजी पीर पास पर कब्जा करने वाले साहसिक हमले का नेतृत्व किया था।
यह पाकिस्तान से कश्मीर में घुसपैठ का प्रमुख मार्ग माना जाता था। इस पर नियंत्रण मिलने से infiltration routes प्रभावित हुए।
नहीं। ताशकंद समझौते के बाद 1966 में भारत ने हाजी पीर पास पाकिस्तान को लौटा दिया था।
बेहद कठिन मौसम, दुर्गम पहाड़ों और मजबूत दुश्मन रक्षा के बावजूद रणनीतिक दर्रे पर कब्जा करना इस लड़ाई की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।
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