दिसंबर 1971 में भारतीय वायु सेना ने ऐसा इतिहास रचा जिसने पूरे युद्ध का परिणाम बदल दिया। मेघना हेलिलिफ्ट, तंगाइल पैराड्रॉप, कराची पर गहरे स्ट्राइक, और बहादुर हवाई युद्ध, इन सबने भारत की प्रगति को तेज किया और पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह अस्थिर कर दिया।
मेघना नदी अपने समय में एक ऐसी चुनौती थी जिसे पार करना लगभग असंभव माना जाता था। डाका पहुँचने का एकमात्र पुल अशुगंज में था—दुश्मन के नियंत्रण, भारी निगरानी और लगातार फायर का क्षेत्र। इसी मोड़ पर लेफ्टिनेंट जनरल सागट सिंह और ग्रुप कैप्टन चंदन सिंह ने ऐसा निर्णय लिया जिसने पूरे अभियान की दिशा बदल दी—नदी को पार करने के लिए व्यापक हवाई-सेतु तैयार किया जाए।
9 दिसंबर की शाम से भारतीय वायु सेना के हेलिकॉप्टर लगातार उड़ानें भरने लगे। पूरी रात सैनिकों और आवश्यक उपकरणों को नदी के दूसरी ओर उतारा गया, जहाँ से वे सीधे डाका की ओर आगे बढ़ते गए। इस निर्णायक शुरुआत के बाद 11 से 15 दिसंबर के बीच युद्ध का सबसे बड़ा हेलिलिफ्ट अभियान चलाया गया। Mi-4 हेलिकॉप्टरों ने ब्रह्मनबारिया, नर्सिंगडी, दौदकांडी और बैद्या बाजार के बीच लगातार उड़ानें भरकर बड़ी संख्या में सैनिकों और भारी सैन्य सामग्री को अग्रिम मोर्चों तक पहुँचाया।
इस दौरान भारतीय वायु सेना ने भैराब बाज़ार पर लगातार दबाव बनाए रखा—एक ऐसा क्षेत्र जिसे पायलट मज़ाक में “प्रैक्टिस रेंज अल्फा” कहते थे। IAF का यह निरंतर हवाई प्रभुत्व दुश्मन को बिल्कुल निष्क्रिय करता गया और ज़मीन पर आगे बढ़र ही भारतीय टुकड़ियों के लिए रास्ता पूरी तरह साफ़ करता रहा।
इन निर्भीक, सटीक और तेज़ एयरलिफ्ट्स ने न सिर्फ मेघना पार कराई—बल्कि डाका की ओर रणनीतिक रास्ता खोलकर युद्ध के अंतिम परिणाम को तेज़ी से भारत के पक्ष में मोड़ दिया।
11 दिसंबर को 2 पैरा को तंगाइल में उतारा गया। उनका उद्देश्य था—पाकिस्तानी 93 ब्रिगेड को डाका की ओर पीछे हटने से रोकना। वे सफल रहे, और इसी क्षण डाका की हार लगभग निश्चित हो गई।
जामनगर से उड़ान भरकर हंटर विमानों ने कराची के किया मारी ऑयल डिपो को निशाना बनाया। हमले के बाद तेल टैंक जल उठे—जिसे एक विदेशी पत्रकार ने “एशिया की सबसे बड़ी आग” कहा।
कराची के कई और टैंक नष्ट हुए, और पाकिस्तान अपने अधिकांश तेल भंडार से हाथ धो बैठा।
कैनबरा विमानों ने कराची harbour और मणोरा naval base पर अंतिम प्रहार किए। ईंधन खत्म होने से पाकिस्तान की सैन्य क्षमता लगभग ढह गई।
युद्ध शुरू होने से पहले ही, भारतीय वायु सेना की 22 स्क्वाड्रन के ग्नैट विमानों ने भारतीय सीमा में घुसे तीन पाकिस्तानी सेबर विमानों को मार गिराया।
Flight Lieutenant Roy Andrew Massey ने इस संघर्ष को ऐसे याद किया: “हम तेज़ गति पर उड़े… दुश्मन पर टर्न लिया… फायर किया… और तीसरे burst में उसे गिरा दिया।”
तीन में से दो पाकिस्तानी पायलट पकड़े गए—और उनमें से एक आगे चलकर PAF का एयर चीफ बना।
14 दिसंबर को श्रीनगर पर छह सेबर विमानों का हमला हुआ। सेखों जी ORP ड्यूटी पर थे, उन्होंने बमबारी के बीच से टेक-ऑफ लिया।
उन्होंने पहले दो सेबर परहिट की। फिर अकेले चार दुश्मन विमानों से पेड़ की ऊँचाई पर डॉगफाइट की। संख्या अधिक होने के कारण वे वीरगति को प्राप्त हुए।
उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र मिला—IAF के इतिहास में पहला और अब तक का एकमात्र।
1971 का युद्ध भारतीय वायु सेना की क्षमताओं की सर्वोच्च परीक्षा था—और उसकी सबसे बड़ी जीत। IAF को मिला:
• 1 परमवीर चक्र
• 13 महा वीर चक्र
• 113 वीर चक्र
पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाज़ी का स्वीकार अभी भी इसकी सबसे सटीक व्याख्या है: “मैंने आत्मसमर्पण किया—क्यों कि भारतीय वायु सेना ने हमें हर दिशा से रोक दिया।”
मेघना हेलिलिफ्ट, तंगाइल पैराड्रॉप, कराची पर गहरी स्ट्राइक, और वीर हवाई अभियानों ने युद्ध की गति और परिणाम दोनों बदल दिए।
भारतीय वायु सेना ने 1971 में जो किया, वह आज भी सैन्य इतिहास का मानक है।
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जय हिंद!


