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ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी: 1971 की लोंगेवाला लड़ाई के अमर नायक

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राजस्थान के रेगिस्तान में स्थित लोंगेवाला पोस्ट आज भी भारतीय सैन्य इतिहास का एक जीवंत अध्याय है। यह वह जगह है जहाँ 1971 के भारत-पाक युद्ध में एक अधिकारी ने सीमित संसाधनों के बावजूद असंभव को संभव कर दिखाया। उस अधिकारी का नाम था ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह  चांदपुरी, जिनकी कहानी साहस, नेतृत्व और अटूट विश्वास की मिसाल बन चुकी है।

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का  प्रारंभिक जीवन 

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का जन्म 22 नवंबर 1940 को अविभाजित भारत के मोंटगोमरी, पंजाब में हुआ। देश के विभाजन के बाद उनका परिवार पंजाब के होशियारपुर ज़िले के अपने पैतृक गांव में आकर बस गया। बचपन से ही उन्होंने देशभक्ति और बलिदान की कहानियाँ सुनीं, जिसने उनके भीतर सेना में जाने की दृढ़ इच्छा पैदा की।

उन्होंने होशियारपुर के सरकारी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1963 में चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से प्रशिक्षण लेकर भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त किया। उन्हें पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन में नियुक्त किया गया।

भारतीय सेना में सेवा और नेतृत्व की  पहचान

सेना में अपने शुरुआती वर्षों से ही ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी एक अनुशासित और दूरदर्शी अधिकारी के रूप में पहचाने जाने लगे। वे अपने सैनिकों के साथ मजबूत संबंध रखते थे और हर निर्णय में ज़मीनी सच्चाई को महत्व देते थे।

उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में भी पश्चिमी मोर्चे पर सेवा दी और बाद में संयुक्त राष्ट्र आपात बल के तहत मिस्र के गाज़ा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन में भी योगदान दिया।

1971 की लोंगेवाला की लड़ाई: इतिहास  बदलने वाला निर्णय

दिसंबर 1971 की वह ठंडी रात भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गई। लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात 120 भारतीय सैनिकों की एक कंपनी की कमान ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी के हाथ में थी। उसी रात उन्हें सूचना मिली कि पाकिस्तानी सेना की एक बड़ी टुकड़ी, जिसमें लगभग 2000 सैनिक और 45 टैंक शामिल थे, लोंगेवाला की ओर बढ़ रही है।

स्थिति बेहद असमान थी। पीछे हटना एक विकल्प था, लेकिन ब्रिगेडियर चांदपुरी ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने पोस्ट को छोड़ने से इनकार किया और अपने जवानों से कहा किवे अंतिम सांस तक मोर्चा संभालेंगे।

लोंगेवाला युद्ध में रणनीति, साहस और  नेतृत्व

रातभर पाकिस्तानी सेना ने बार-बार हमला किया, लेकिन ब्रिगेडियर चांदपुरी ने इलाके की भौगोलिक जानकारी और सीमित हथियारों का प्रभावी उपयोग किया। उन्होंने एंटी-टैंक हथियारों की सही तैनाती करवाई और हर बंकर में जाकर स्वयं जवानों का हौसला बढ़ाया।

उन्होंने लगातार अपने वरिष्ठ अधिकारियों से रेडियो संपर्क बनाए रखा और वायु सहायता की मांग करते रहे। भोर होते-होते भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने दुश्मन के टैंकों पर सटीक हमले किए। इस निर्णायक कार्रवाई में 22 पाकिस्तानी टैंक नष्ट हुए, जबकि कई टैंक युद्ध क्षेत्र में छोड़ दिए गए और दुश्मन सेना को पीछे हटना पड़ा।

महावीर चक्र और राष्ट्रीय सम्मान

लोंगेवाला की लड़ाई में असाधारण वीरता और नेतृत्व के लिए ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी को महावीर चक्र, भारत का दूसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार, प्रदान किया गया। यह सम्मान उनके अदम्य साहस और शांत निर्णय क्षमता का प्रतीक बना।

उनकी कहानी को 1997 की फिल्म “बॉर्डर” के माध्यम से देशभर में पहचान मिली, जिसमें उनका किरदार अभिनेता सनी देओल ने निभाया। इस फिल्म ने नई पीढ़ी को लोंगेवाला के नायकों से परिचित कराया।

युद्ध के बाद का जीवन और समाज सेवा

युद्ध के बाद ब्रिगेडियर चांदपुरी भारतीय सेना में सेवा करते रहे और अंततःब्रिगेडियर के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद वे चंडीगढ़ में बस गए और सैनिकों के कल्याण, नागरिक मुद्दों और युवाओं के मार्गदर्शन से जुड़े रहे।

वे एक सादा जीवन जीने वाले व्यक्ति थे। उन्हें War Decorated India जैसे संगठनों से भी सम्मान मिला और वे चंडीगढ़ नगर निगम में पार्षद के रूप में भी नामित किए गए।

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी  से जुड़े कम चर्चित तथ्य

ब्रिगेडियर चांदपुरी बाबा दीप सिंह के वंशज थे, जो एक महान सिख योद्धा माने जाते हैं। लोंगेवाला की लड़ाई में उनके नेतृत्व में एक भी भारतीय सैनिक शहीद नहीं हुआ। उन्होंने हमले से पहले खाइयों और बारूदी सुरंगों की तैनाती स्वयं देखी थी। वे पूरी लड़ाई के दौरान उच्च अधिकारियों को वास्तविक समय की जानकारी देते रहे।

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी की  विरासत और प्रेरणा

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी की कहानी केवल युद्ध की नहीं है, बल्कि नेतृत्व और आत्मविश्वास की कहानी है। जब हालात विपरीत थे, तब उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपने निर्णय पर विश्वास किया और अपने सैनिकों पर भरोसा रखा।

आज भी भारतीय सैन्य अकादमियों में उनका उदाहरण पढ़ाया जाता है। उनके नाम पर संस्थान और स्मृति चिह्न स्थापित किए गए हैं। उनका साहस भारतीय सेना की परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। 

17 नवंबर 2018 को उनके निधन के साथ एक युग का अंत हुआ, लेकिन उनकी कहानी आज भी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है जो देश के लिए कुछ कर गुजरने का सपना देखता है।

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा रहेगा।

आज के लिए बस इतना ही। 

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