भारत का सैन्य इतिहास ऐसे वीरों से भरा है जिन्होंने असंभव परिस्थितियों में भी कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। स्वतंत्रता के तुरंत बाद ऐसे ही एक वीर अधिकारी थे मेजर सोमनाथ शर्मा, जिन्होंने 1947–48 के कश्मीर युद्ध में अपने अद्वितीय साहस और नेतृत्व से इतिहास रच दिया। वे भारत के पहले सैनिक थे जिन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को धाध, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में हुआ। वे भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारी मेजर जनरल ए. एन. शर्मा के पुत्र थे। उन्हें 22 फरवरी 1942 को कुमाऊँ रेजिमेंट में कमीशन मिला।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अराकान अभियान में वीरता के साथ भाग लिया। कम उम्र में ही वे एक अनुशासित और साहसी अधिकारी के रूप में पहचाने जाने लगे। उनके छोटे भाई जनरल वी. एन. शर्मा बाद में 1988 से 1990 तक भारतीय सेना के थल सेनाध्यक्ष रहे।
22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित कबायली आक्रमणकारियों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया। 26 अक्टूबर 1947 को राज्य के भारत में विलय के बाद उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भारतीय सेना पर आई।
भारतीय सैनिकों को तुरंत श्रीनगर एयरलिफ्ट किया गया, जहाँ उन्होंने समय रहते आक्रमणकारियों को शहर की सीमा पर रोक दिया। श्रीनगर और उसका हवाई अड्डा रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
31 अक्टूबर 1947 को 4 कुमाऊँ की डी कंपनी, मेजर सोमनाथ शर्मा के नेतृत्व में, श्रीनगर पहुँची। उस समय उनका दाहिना हाथ प्लास्टर में था और उन्हें विश्राम की सलाह दी गई थी, फिर भी उन्होंने अपनी कंपनी के साथ जाने का आग्रह किया।
3 नवंबर 1947 को बडगाम क्षेत्र में दुश्मन की गतिविधियों की सूचना पर भारतीय गश्ती दल भेजा गया। दो कंपनियाँ लौट आईं, लेकिन डी कंपनी को वहीं रुकने का आदेश मिला।
दोपहर बाद लगभग 700 हथियार बंद आक्रमणकारियों ने अचानक हमला कर दिया। दुश्मन के पास मोर्टार, भारी स्वचालित हथियार और छोटे हथियार थे।
“अंतिम सांस और अंतिम गोली तक लड़ूँगा”
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मेजर शर्मा ने अपने सैनिकों को डटे रहने के लिए प्रेरित किया। दुश्मन की भारी गोलाबारी के बीच उन्होंने वायुसेना के लिए लक्ष्य संकेत भी स्वयं लगाए।
घायल होने के बावजूद वे मशीन गनों के लिए मैगज़ीन भरते और गोला-बारूद वितरित करते रहे। इसी दौरान पास में गिरे एक मोर्टार गोले के विस्फोट में वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी आयुमात्र 24 वर्ष थी।
ब्रिगेड मुख्यालय को भेजा गया उनका अंतिम संदेश अमर हो गया:
“मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूँगा अंतिम आदमी और अंतिम गोली तक लड़ूँगा।”
बडगाम की लड़ाई में मेजर शर्मा, एक जेसीओ और डी कंपनी के 20 जवान शहीद हुए। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके साहस ने श्रीनगर और हवाई अड्डे को बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
असाधारण वीरता के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके पिता ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से प्राप्त किया।
मेजर सोमनाथ शर्मा का जीवन भारतीय सेना के सर्वोच्च मूल्यों का प्रतीक है। उनका साहस, नेतृत्व और बलिदान आज भी हर भारतीय को प्रेरणा देता है।
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जय हिंद।
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