3 जून 1947 को घोषित Mountbatten Plan ब्रिटिश भारत के विभाजन की आधिकारिक रूपरेखा था। इसी योजना ने भारत और पाकिस्तान के निर्माण, सत्ता हस्तांतरण और 15 अगस्त 1947 की आजादी का रास्ता तैयार किया। इसके परिणामस्वरूप इतिहास के सबसे बड़े विस्थापनों और सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में से एक देखने को मिली।
3 जून 1947: जब एक घोषणा ने करोड़ों लोगों की किस्मत बदल दी..
दिल्ली की वह शाम बेचैन थी। सरकारी इमारतों के गलियारों में असामान्य हलचल थी। बड़े नेताओं की गाड़ियां लगातार आ-जा रही थीं। कमरे बंद थे, चर्चाएं तेज थीं और बाहर इंतजार कर रहा था एक पूरा उपमहाद्वीप।
लोग आजादी की उम्मीद कर रहे थे।
लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि आजादी के साथ एक ऐसी रेखा भी खींची जाने वाली है जो आने वाली पीढ़ियों तक दर्द, विस्थापन और संघर्ष की कहानी बन जाएगी।
3 जून 1947 को घोषित Mountbatten Plan सिर्फ एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं था। यह वह योजना थी जिसने ब्रिटिश भारत के अंत, भारत और पाकिस्तान के जन्म, और दक्षिण एशिया के भविष्य की दिशा तय कर दी।
1947 तक ब्रिटिश शासन स्पष्ट रूप से कमजोर पड़ चुका था।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक और राजनीतिक दबाव में था। दूसरी ओर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंच चुका था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद लगातार बढ़ रहे थे। कई क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव हिंसा में बदल रहा था।
ऐसे माहौल में ब्रिटेन ने अंतिम वायसराय के रूप में लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत भेजा।
उनका मिशन था: सत्ता का हस्तांतरण जितनी जल्दी और जितना संभव हो उतना व्यवस्थित तरीके से करना।
3 जून 1947 को उन्होंने वह योजना प्रस्तुत की जिसे इतिहास आज Mountbatten Plan के नाम से जानता है।
सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव था ब्रिटिश भारत का विभाजन।
योजना के अनुसार दो नए डोमिनियन बनने थे:
इसके साथ ही दोनों देशों को अपना संविधान बनाने का अधिकार दिया जाना था।
यह सिर्फ नक्शे पर नई सीमाएं खींचने का मामला नहीं था। यह प्रशासन, सेना, रेलवे, खजाने, संपत्तियों और करोड़ों लोगों के भविष्य को बांटने का प्रश्न था।
कल्पना कीजिए।
दशकों से एक ही प्रशासनिक ढांचे में रहने वाला विशाल भूभाग अचानक दो देशों में बदलने वाला था। लाखों परिवारों को यह भी नहीं पता था कि कुछ सप्ताह बाद उनका गांव किस देश में होगा।
भारत के विभाजन का सबसे कठिन हिस्सा सीमाएं तय करना था।
पंजाब और बंगाल ऐसे प्रांत थे जहां विभिन्न समुदाय बड़ी संख्या में रहते थे। इन्हें कैसे बांटा जाए, इसका फैसला करने के लिए एक सीमा आयोग बनाया गया।
इसके अध्यक्ष थे सर सिरिल रेडक्लिफ।
दिलचस्प बात यह है कि रेडक्लिफ इससे पहले भारत कभी नहीं आए थे। उन्हें कुछ ही हफ्तों में ऐसे नक्शे तैयार करने थे जो करोड़ों लोगों की जिंदगी बदलने वाले थे।
जब अंतिम सीमाएं घोषित हुईं तो कई गांव, शहर और परिवार एक झटके में अलग-अलग देशों में पहुंच गए।
विभाजन केवल ब्रिटिश प्रांतों तक सीमित नहीं था।
उस समय भारत में 565 से अधिक रियासतें थीं। इन पर स्थानीय राजा, नवाब और महाराजा शासन करते थे।
Mountbatten Plan ने ब्रिटिश अधिराज्य समाप्त कर दिया। इसके बाद रियासतों को निर्णय लेना था कि वे भारत में शामिल हों या पाकिस्तान में।
यहीं से आधुनिक भारत के एक और महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत हुई।
कुछ रियासतों ने तुरंत फैसला कर लिया। लेकिन हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्रों में स्थिति जटिल हो गई।
आने वाले वर्षों में इन्हीं फैसलों ने कई राजनीतिक और सैन्य घटनाओं को जन्म दिया।
यह शायद स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे भावनात्मक और कठिन क्षण था।
जवाहरलाल नेहरू ने इस योजना को खुशी से नहीं, बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी के रूप में स्वीकार किया। उनका मानना था कि बढ़ती हिंसा और राजनीतिक गतिरोध के बीच यही रास्ता आगे बढ़ने का अवसर दे सकता था।
दूसरी ओर मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग लंबे समय से अलग पाकिस्तान की मांग कर रहे थे। इसलिए उन्होंने इस योजना का स्वागत किया।
लेकिन सभी सहमत नहीं थे।
मौलाना अबुल कलाम आजाद और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं ने विभाजन का विरोध किया।
महात्मा गांधी के लिए यह फैसला बेहद पीड़ादायक था।
वे जीवन भर एक संयुक्त भारत की कल्पना करते रहे थे। विभाजन उनके लिए राजनीतिक घटना से अधिक एक मानवीय त्रासदी थी।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
लेकिन जश्न के साथ भय भी मौजूद था।
ट्रेनें शरणार्थियों से भरी हुई थीं। सड़कों पर लाखों लोग नए घरों की तलाश में निकल पड़े थे। कई परिवार रातोंरात बेघर हो गए।
इतिहासकारों के अनुसार करोड़ों लोगों ने सीमा पार की और लाखों लोग सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आए।
आजादी का सपना सच हुआ, लेकिन उसकी कीमत भी असाधारण रूप से भारी थी।
कई लोगों को लगता है कि Mountbatten Plan सिर्फ इतिहास का विषय है।
वास्तविकता इससे अलग है।
आज भारत-पाकिस्तान संबंध, जम्मू-कश्मीर विवाद, सीमा सुरक्षा, शरणार्थी इतिहास, राष्ट्रीय पहचान और दक्षिण एशिया की राजनीति को समझने के लिए 1947 को समझना जरूरी है। भारतीय सेना की कई महत्वपूर्ण deployments, सीमा प्रबंधन की चुनौतियां और दोनों देशों के बीच मौजूद अविश्वास की जड़ें उसी दौर तक जाती हैं।
यानी 3 जून 1947 की घोषणा केवल अतीत नहीं है।
उसकी गूंज आज भी सुनाई देती है।
अगर विभाजन नहीं होता तो क्या दक्षिण एशिया का इतिहास अलग होता?
इस प्रश्न का निश्चित उत्तर शायद कभी नहीं मिलेगा।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि Mountbatten Plan ने घटनाओं की ऐसी श्रृंखला शुरू की जिसने दो देशों का निर्माण किया, करोड़ों लोगों की किस्मत बदली और एक पूरे क्षेत्र की राजनीतिक दिशा तय कर दी।
यह स्वतंत्रता की कहानी है।
लेकिन यह बिछड़ने की कहानी भी है।
यह राष्ट्र निर्माण की कहानी है।
लेकिन यह मानवीय पीड़ा की कहानी भी है।
और शायद इसी कारण 3 जून 1947 इतिहास की सबसे निर्णायक तारीखों में से एक माना जाता है।
भारत के इतिहास को समझना केवल तारीखें याद करना नहीं है। यह उन फैसलों को समझना है जिन्होंने आज के भारत को आकार दिया। ऐसे ही इतिहास, defence और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विश्लेषण पढ़ने के लिए FaujiBeats. से जुड़े रहें, हमारे सोशल मीडिया चैनलों को फॉलो करें और newsletter से जुड़ें ताकि कोई महत्वपूर्ण कहानी आपसे छूट न जाये!
जय हिन्द!
Mountbatten Plan 3 जून 1947 को घोषित वह योजना थी जिसने ब्रिटिश भारत के विभाजन और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा तय की।
क्योंकि इसी योजना ने भारत और पाकिस्तान के गठन का रास्ता तैयार किया।
Mountbatten Plan के बाद बने Indian Independence Act 1947 के तहत 15 अगस्त 1947 को सत्ता हस्तांतरण तय किया गया।
उन्हें भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया था।
नहीं। गांधीजी विभाजन से दुखी थे और एक संयुक्त भारत चाहते थे।
करोड़ों लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ा और व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई।
हां। भारत-पाकिस्तान संबंधों, सीमा विवादों और क्षेत्रीय राजनीति पर इसका प्रभाव आज भी देखा जा सकता है।


