वो सन्नाटा… वो शांति… ना टीवी की आवाज, ना रेडियो की धुन…बस किताब के पन्ने पलटने की धीमी आवाज।
यह किसी हॉरर मूवी का दृश्य नहीं है। यह हमारे घरों का वही परिचित माहौल है, जब एग्ज़ाम (खासकर board exams) शुरू होते हैं। दरवाज़े धीरे से बंद किए जाते हैं। बातचीत सीमित हो जाती है। घर का हर सदस्य यह ध्यान रखता है कि कोई अनावश्यक शोर न हो।
सच तो यह है कि इन दिनों केवल बच्चा ही एग्ज़ाम नहीं दे रहा होता, बल्कि पेरेंट्स भी मानसिक रूप से उसी परीक्षा से गुजर रहे होते हैं।
और जब पेरेंट एक फौजी हो, जो ड्यूटी के कारण घर से दूर पोस्टेड हो, तब यह चिंता और भी गहरी हो जाती है।
फौजी पेरेंट्स अक्सर इन बातों को लेकर चिंतित रहते हैं:
दूर रहकर बच्चे को सपोर्ट करना आसान नहीं होता, लेकिन सही सोच और सही तरीके से आप उसके लिए मजबूत इमोशनल सहारा बन सकते हैं।
हर कॉल में केवल पढ़ाई से जुड़े सवाल पूछना सही तरीका नहीं है। यदि आप हर बार पूछेंगे कि कितने चैप्टर बचे हैं या कितने मार्क्स आए हैं, तो बच्चा दबाव महसूस कर सकता है।
इसके बजाय आप यह पूछ सकते हैं कि वह कैसा महसूस कर रहा है या इस हफ्ते उसे सबसे कठिन क्या लगा।
जब बच्चा बिना डर के अपनी बात कह पाता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। कई बार बच्चों को समाधान से अधिक एक ध्यान से सुनने वाला चाहिए होता है।
अक्सर लंबी और थकाऊ बातचीत की आवश्यकता नहीं होती। यदि आप रोज़ 5 से 7 मिनट शांत और सकारात्मक बातचीत करते हैं, तो वह पर्याप्त है।
सुबह एक छोटा सा प्रेरणादायक संदेश, एग्ज़ाम के दिन शुभकामना, और रात में आश्वासन के दो शब्द बच्चे को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाए रखते हैं।
नियमितता, लंबाई से अधिक महत्वपूर्ण होती है।
आज के समय में दूरी केवल भौतिक (physical) होती है, भावनात्मक (emotional) नहीं।
आप वीडियो कॉल के माध्यम से कभी-कभी साथ खाना खा सकते हैं। आप पहले से एग्ज़ाम शेड्यूल नोट कर सकते हैं और महत्वपूर्ण पेपर वाले दिन विशेष रूप से प्रोत्साहन दे सकते हैं।
जब बच्चा यह महसूस करता है कि उसके पेरेंट भले दूर हैं, लेकिन उसका साथ नहीं छोड़ रहे, तो उसका मनोबल बढ़ता है।
एग्ज़ाम के दौरान कई पेरेंट्स अनजाने में एग्ज़ाम सुपरवाइज़र की भूमिका निभाने लगते हैं। वे हर घंटे पढ़ाई की निगरानी करते हैं, तुलना करते हैं और अनावश्यक दबाव बना देते हैं।
एक सपोर्टिव पेरेंट का काम वातावरण तैयार करना होता है, न कि पूरी प्रक्रिया को नियंत्रित करना।
आप बच्चे को टाइमटेबल बनाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन पढ़ाई की जिम्मेदारी उसी की रहने दें। जब बच्चा खुद निर्णय लेता है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।
यह एक सरल और प्रभावी तरीका है।
बोर्ड एग्ज़ाम के समय बच्चे अक्सर मार्गदर्शन चाहते हैं, नियंत्रण नहीं।
यह स्वीकार करना आवश्यक है कि एग्ज़ाम (खासकर board exams) के समय पेरेंट्स भी स्ट्रेस में होते हैं। यदि पेरेंट लगातार तुलना करते हैं, व्हाट्सऐप ग्रुप में रैंक और मार्क्स की चर्चा करते हैं या हर समय चिंता व्यक्त करते हैं, तो बच्चा भी उसी तनाव को महसूस करता है।
इस समय पेरेंट्स को अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए:
बच्चे को एक शांत और संतुलित वयस्क की आवश्यकता होती है।
कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद मानसिक संतुलन और ध्यान के लिए जरूरी है। ऑल-नाइटर से बचना चाहिए।
सरल और घर का बना हुआ भोजन पर्याप्त है, जैसे पोहा, दाल-चावल, खिचड़ी, पनीर या अंडा रोल।
बहुत भारी या अत्यधिक तथाकथित ब्रेन फूड देने की आवश्यकता नहीं है।
हर 60 से 90 मिनट बाद छोटा ब्रेक लेना दिमाग को तरोताजा करता है। हल्की वॉक या स्ट्रेचिंग लाभकारी होती है।
यदि बच्चा लगातार उदास रहता है, बहुत चुप हो जाता है, खाना छोड़ देता है या उसे नींद नहीं आती, तो यह सामान्य एग्ज़ाम तनाव से अधिक हो सकता है।
ऐसी स्थिति में किसी काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना सही कदम है।
हर पेपर के बाद प्रोत्साहन दें। किसी विषय के पूरा होने पर सराहना करें।
रिज़ल्ट से पहले ही यह कहें कि आपको उस पर गर्व है।
मार्क्स महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन आत्मविश्वास उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
ड्यूटी और पेरेंटिंग दोनों जिम्मेदारियां साथ निभाना आसान नहीं है। लेकिन बच्चा यह हमेशा याद रखेगा कि एग्ज़ाम के समय उसके पेरेंट्स ने उसे कैसा महसूस कराया।
यदि घर का माहौल शांत और सहयोगपूर्ण रहेगा, तो पढ़ाई बेहतर होगी और परिणाम भी संतुलित रूप से आएंगे।
यदि आपके बच्चे एग्ज़ाम्स दे रहे हैं तो FaujiBeats उनके सफल भविष्य की कामना करता है!
जय हिन्द!
Fauji Aspirants 
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