कारगिल की बर्फ़ीली चोटियों पर भारतीय सेना दुश्मन से आमने-सामने की लड़ाई लड़ रही थी। दूसरी ओर, आसमान में भारतीय वायुसेना एक ऐसी चुनौती का सामना कर रही थी, जिसका अनुभव दुनिया की बहुत कम वायुसेनाओं को हुआ था।
14,000 से 18,000 फीट की ऊँचाई, बेहद पतली हवा, दुर्गम पहाड़ और दुश्मन की मिसाइलें, इन सबके बीच भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन सफेद सागर शुरू किया। यही वह अभियान था जिसने कारगिल युद्ध की दिशा बदल दी।
कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने 5,000 से अधिक मिशन उड़ाए। इनमें हमला, निगरानी, सैनिकों की सहायता और घायलों को निकालने जैसे कई अभियान शामिल थे।
26 मई 1999 को शुरू हुआ ऑपरेशन सफेद सागर, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में भारतीय वायुसेना का सबसे बड़ा सैन्य अभियान था।
हालाँकि, इस अभियान के साथ एक बड़ी चुनौती भी थी। भारत सरकार ने स्पष्ट आदेश दिया था कि भारतीय लड़ाकू विमान नियंत्रण रेखा (LoC) पार नहीं करेंगे। इसका मतलब था कि वायुसेना को दुश्मन के ठिकानों पर हमला भी भारतीय सीमा के भीतर से ही करना था।
शुरुआती दिनों में पायलटों को बिना आधुनिक तकनीक के केवल आँखों से दुश्मन के ठिकानों की पहचान करनी पड़ती थी। लेकिन जून 1999 में मिराज-2000 विमानों में लेज़र-गाइडेड बम लगाए गए, जिससे भारतीय वायुसेना दुश्मन के बंकरों पर बेहद सटीक हमला करने लगी।
24 जून 1999 को टाइगर हिल के आसपास हुए ऐसे ही हमलों ने भारतीय सेना के लिए जीत का रास्ता तैयार किया।
कारगिल युद्ध, दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्रों में से एक था। इतनी ऊँचाई पर लड़ाकू विमानों और हथियारों की क्षमता प्रभावित होती है।
इसके बावजूद, भारतीय वायुसेना ने:
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा भारतीय वायुसेना की 17 स्क्वाड्रन "गोल्डन एरोज़" के फ्लाइट कमांडर थे।
27 मई 1999 को कारगिल अभियान के दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट के. नचिकेता का मिग-27 तकनीकी खराबी के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया। ऐसे समय में स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा अपने साथी की स्थिति का पता लगाने और बचाव अभियान में मदद करने के लिए दुश्मन के इलाके के ऊपर डटे रहे।
इसी दौरान उनके मिग-21 को पाकिस्तानी स्टिंगर मिसाइल ने निशाना बना लिया।
उन्होंने सुरक्षित रूप से पैराशूट के जरिए बाहर निकलने में सफलता हासिल की, लेकिन बाद में दुश्मन के कब्जे में आ गए और वीरगति को प्राप्त हुए।
उनके साहस, नेतृत्व और अपने साथी के प्रति समर्पण के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
आज भी स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा भारतीय वायुसेना में कर्तव्य और साथीपन की मिसाल माने जाते हैं।
28 मई 1999 को भारतीय वायुसेना की नुब्रा फॉर्मेशन को द्रास सेक्टर में स्थित पॉइंट 5140 के पास दुश्मन की चौकियों पर हमला करने का आदेश मिला।
इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे विंग कमांडर अनिल कुमार सिन्हा।
विंग कमांडर सिन्हा और उनकी टीम ने दुश्मन की भारी गोलीबारी के बीच हेलिकॉप्टर गनशिप के जरिए सटीक रॉकेट हमले किए। इस कार्रवाई में दुश्मन को भारी नुकसान हुआ और भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ने का रास्ता आसान हुआ।
कारगिल युद्ध में उनके साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
बाद में वे भारतीय वायुसेना में एयर कमोडोर के पद तक पहुँचे और 2010 में सेवानिवृत्त हुए।
कारगिल युद्ध के शुरुआती दिनों में भारतीय वायुसेना को दुश्मन के बंकरों को नष्ट करने में काफी कठिनाई हो रही थी।
लेकिन जब मिराज-2000 विमानों में लेज़र-गाइडेड बम लगाए गए, तब तस्वीर बदल गई।
16 और 17 जून 1999 को मुनथो ढालो में पाकिस्तानी सेना के बड़े सप्लाई बेस पर हुए हमलों ने दुश्मन की रसद व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर दिया।
इसके बाद टाइगर हिल, मश्कोह घाटी और द्रास सेक्टर में भारतीय सेना की कार्रवाई तेज़ हो गई।
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने पहाड़ों पर लड़ाई लड़ी, लेकिन उन जवानों को जीत तक पहुँचाने में भारतीय वायुसेना की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी।
ऑपरेशन सफेद सागर ने साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, बल्कि आसमान में भी जीते जाते हैं।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा और विंग कमांडर अनिल कुमार सिन्हा जैसे वीरों ने दिखाया कि भारतीय सैनिकों के लिए कर्तव्य और देश सबसे ऊपर हैं।
अगर आपने हमारी Kargil War Series के पिछले भाग नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें। कारगिल विजय की कहानी इन बहादुर सैनिकों और वायुयोद्धाओं के बिना अधूरी है।
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जय हिन्द!
ऑपरेशन सफेद सागर कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना का अभियान था, जिसे 26 मई 1999 को शुरू किया गया था।
भारतीय वायुसेना ने 550 स्ट्राइक मिशन, 150 टोही मिशन, 500 एस्कॉर्ट मिशन और 2,185 हेलिकॉप्टर उड़ानें भरी थीं।
स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन के ठिकानों पर सफल हेलिकॉप्टर हमलों और असाधारण साहस के लिए उन्हें वीर चक्र प्रदान किया गया था।
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