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ऑपरेशन 'पुंछ': जब फौजियों ने इतिहास बदल दिया!

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जम्मू–कश्मीर का पुंछ (Poonch) अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, शांत वादियों और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। Pir Panjal पर्वत श्रृंखला, नूरी छम्ब और नंदिशूल जैसे झरने, तथा सेवन लेक्स वैली (Seven Lakes Valley) जैसी जगहें इस क्षेत्र को विशेष बनाती हैं। इसके अलावा पुंछ किला, बुद्धा अमरनाथ मंदिर और गुरुद्वारा नंगाली साहिब जैसी धार्मिक और ऐतिहासिक जगहें भी यहाँ की पहचान हैं।

लेकिन इस सुरम्य भूमि ने एक ऐसा संघर्ष भी देखा है जिसने भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्ण अध्याय जोड़ा; पुंछ लिंक-अप

पुंछ लिंक-अप: 14 महीने की घेराबंदी का अंत

1947–48 में पाकिस्तान समर्थित कबीलों और टुकड़ियों ने पुंछ को चारों ओर से घेर लिया था। यह घेरा करीब 14 महीनों तक जारी रहा। उस समय न तो शहर में राशन पहुँच पा रहा था, न दवाइयाँ और न ही कोई सहायता। इसके बावजूद भारतीय सेना और स्थानीय लोगों ने पूरे साहस के साथ स्थिति का सामना किया।

ऑपरेशन रेस्क्यू: जम्मू से पुंछ को जोड़ने की निर्णायक लड़ाई

भारतीय सेना ने मार्च 1948 में जम्मू की दिशा से “ऑपरेशन रेस्क्यू” शुरू किया। इस अभियान में कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर जीत हासिल की गई:

18 मार्च 1948: 

भारतीय सैनिकों ने झांगर पर कब्जा किया और 300 पाकिस्तानी हमलावरों को मार गिराया।

12 अप्रैल 1948: 

राजौरी शहर मुक्त कराया गया।

20 जून 1948 तक: 

थन्ना मंडी, धेरा गली, बुडहल, बफलियाज़ और सुरनकोट दुश्मन से वापस ले लिए गए।

14 अक्टूबर:

पीर बर्देश्वर पर कब्जा।

26 अक्टूबर:

पीर कलेवा को मुक्त कराया गया। ब्रिगेडियर यादो नाथ सिंह और लेफ्टिनेंट कर्नल जगजीत सिंह अरोड़ा ने भिंबर गली को भी दुश्मन से वापस ले लिया, जो एक महत्वपूर्ण पास था।

19 नवंबर: 

ब्रिगेडियर उमराव सिंह की 19 इन्फैंट्री ब्रिगेड ने पीर टोपा पर कब्जा किया। इसी दौरान पुंछ की ओर से भी कार्रवाई जारी रही। लेफ्टिनेंट कर्नल चंदन सिंह के नेतृत्व में पुंछ गैरीसन की टुकड़ियों ने पंज ककरियान ridge को पार किया।

20 नवंबर: 

दनियान पीर पहुँचकर सौ से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया।

21 नवंबर 1948:

दोनों ओर से आगे बढ़ रही भारतीय सेनाओं, ब्रिगेडियर उमराव सिंह और लेफ्टिनेंट कर्नल चंदन सिंह, ने दनियान पीर में एक-दूसरे से मिलकर जम्मू–पुंछ लिंक-अप को सफलतापूर्वक पूरा किया। यह रणनीतिक सफलता पुंछ की 14 महीने पुरानी घेराबंदी समाप्त होने का प्रतीक थी।

ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह: पुंछ के संरक्षक

ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह ने पुंछ शहर को 16 महीनों तक सुरक्षित रखा। उनकी कमान में भारतीय सैनिकों ने दो पाकिस्तानी ब्रिगेड, 60,000 पुंछ रियासत के विद्रोहियों और 3,000 अफ़रीदी कबीलों के हमलों का मुकाबला किया।

इस दौरान दुश्मन एक भी पोस्ट पर कब्जा नहीं कर सका।

बल्कि ब्रिगेडियर प्रीतम सिंह ने गुलपुर, झुल्लास, ढोखरी, छज्जा, कानुइयाँ और खानातर जैसी महत्वपूर्ण जगहों को वापस अपने नियंत्रण में लिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और नेतृत्व ने लिंक-अप अभियान को सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

इस जीत का रणनीतिक और राष्ट्रीय महत्व

रणनीतिक विजय: 

दक्षिण Pir Panjal का लगभग 250 किलोमीटर लंबा क्षेत्र दुश्मन से मुक्त हुआ।

जनता की दृढ़ता: 

पुंछ की जनता ने भूख, ठंड और भय के बावजूद आशा नहीं छोड़ी।

एकता का संदेश: 

सेना और नागरिकों की एकजुटता ने असंभव दिखने वाली स्थिति को बदल दिया।

भारत का आत्मविश्वास: 

यह जीत आजाद भारत के शुरुआती सैन्य इतिहास का सबसे गर्वपूर्ण क्षणों में से एक बनी।

यह दिवस उन सैनिकों के बलिदान को नमन करने का अवसर है जिन्होंने देश को सुरक्षित रखने के लिए अपनी जान तक न्यौछावर कर दी।

इस वर्ष पुंछ लिंक-अप की 77वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। इस अवसर पर भारतीय सेना की घाड़ी बटालियन ने “ऑपरेशन सिंदूर” थीम पर एक टैलेंट हंट कार्यक्रम आयोजित किया। हर साल 22–23 नवंबर को मनाया जाने वाला यह दिवस पुंछवासियों और सेना दोनों के लिए गर्व का प्रतीक है। इस वर्ष का आयोजन भी वीरता, स्मरण और देशभक्ति के उसी भाव को फिर से दोहरा रहा है।

पुंछ लिंक-अप डे हमें यह याद दिलाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी साहस, एकजुटता और दृढ़ संकल्प से, बड़ी से बड़ी चुनौती को पार किया जा सकता है।

FaujiBeats भारतीय सेना के उन वीर जवानों को सलाम करता है, जिन्होंने पुंछ की रक्षा के लिए असाधारण साहस दिखाया और देश के सम्मान को सर्वोपरि रखा। उनका पराक्रम आज भी हर भारतीय के मन में गर्व और प्रेरणा जगाता है।

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