कुछ सैन्य अधिकारी अपनी बहादुरी या ऑपरेशनल उपलब्धियों के लिए पहचाने जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें देश बार-बार टीवी स्क्रीन, राष्ट्रीय समारोहों और महत्वपूर्ण राजकीय कार्यक्रमों में देखता है। लेकिन कैमरे के सामने दिखाई देने वाली वह मौजूदगी, अक्सर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का सिर्फ छोटा-सा हिस्सा होती है।
मेजर ऋषभ सिंह सांब्याल ऐसे ही अधिकारियों में से एक रहे हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के Aide-de-Camp यानी ADC के रूप में उनकी तस्वीरें और वीडियो पिछले कुछ समय में सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में रहे। अगस्त 2026 में करीब 12 साल की सैन्य सेवा के बाद उनके भारतीय सेना से समयपूर्व रिटायरमेंट की खबर सामने आई। रिटायरमेंट के बाद 21 अगस्त को राष्ट्रपति मुर्मू से उनकी मुलाकात की तस्वीरें भी सामने आईं।
लेकिन उनकी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा सिर्फ यह नहीं है कि वह राष्ट्रपति के साथ दिखाई देते थे।
उनकी सैन्य यात्रा में 2021 की गणतंत्र दिवस परेड में Jat Regiment की टुकड़ी का नेतृत्व, 4 Para (Special Forces) में सेवा और इसके बाद राष्ट्रपति के ADC के रूप में जिम्मेदारी निभाना शामिल रहा। 2021 में उनके नेतृत्व वाली Jat Regiment की टुकड़ी को Best Marching Contingent Trophy भी मिली थी।
यही वह जगह है जहां एक बड़ा सवाल सामने आता है: आखिर राष्ट्रपति का ADC होता कौन है? वह करता क्या है और इस पद तक पहुंचने के लिए एक सैन्य अधिकारी को किन खूबियों की जरूरत होती है?
आइए इसे आसान भाषा में समझते हैं।
सबसे पहले नाम समझते हैं।
Aide-de-Camp एक फ्रेंच शब्द है, जिसका सामान्य अर्थ किसी वरिष्ठ अधिकारी या प्रमुख की सहायता करने वाला सैन्य अधिकारी है। आसान भाषा में कहें तो ADC वह commissioned Armed Forces officer होता है जो किसी वरिष्ठ संवैधानिक या सैन्य पदाधिकारी के साथ आधिकारिक कार्यक्रमों, समारोहों और विभिन्न engagements के दौरान महत्वपूर्ण coordination और protocol responsibilities संभालता है।
लेकिन इसे सिर्फ "personal assistant" समझना सही नहीं होगा।
एक ADC को सैन्य अनुशासन के साथ-साथ protocol, communication, coordination, समय प्रबंधन और official conduct की अच्छी समझ होनी चाहिए।
राष्ट्रपति के मामले में यह जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि राष्ट्रपति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर होते हैं और Armed Forces के Supreme Commander भी हैं।
राष्ट्रपति के ADC की भूमिका इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें तीनों Services का प्रतिनिधित्व दिखाई देता है।
परंपरागत व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति की सहायता के लिए पांच ADC होते हैं:
इस तरह राष्ट्रपति के ADC दल में तीनों Armed Forces का प्रतिनिधित्व होता है।
यानी जब आप राष्ट्रपति के किसी राष्ट्रीय समारोह में उनके साथ अलग-अलग ceremonial uniform में अधिकारियों को देखते हैं, तो वह सिर्फ protocol का हिस्सा नहीं है। वहां भारतीय Armed Forces की तीनों Services की मौजूदगी भी दिखाई देती है।
यह शायद इस पूरी भूमिका का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
किसी राष्ट्रीय समारोह में राष्ट्रपति के साथ खड़ा ADC देखकर लग सकता है कि उसकी जिम्मेदारी मुख्य रूप से ceremonial है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है।
एक ADC की जिम्मेदारियों में आम तौर पर कई स्तर शामिल होते हैं।
राष्ट्रपति के कार्यक्रमों में कई तरह के engagements होते हैं—राष्ट्रीय समारोह, सैन्य कार्यक्रम, investiture ceremonies, विदेशी प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात, official visits और अन्य संवैधानिक कार्यक्रम।
इन engagements के दौरान ADC official arrangements और coordination में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राष्ट्रपति से जुड़े कार्यक्रमों में protocol की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
कौन किस समय पहुंचेगा, किस क्रम में स्वागत होगा, कौन कहां खड़ा होगा, ceremonial movement कैसे होगा, ऐसी छोटी-छोटी बातें भी बड़े कार्यक्रम की smooth execution के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।
ADC इस पूरे protocol environment का हिस्सा होता है।
किसी राष्ट्रपति के कार्यक्रम में सिर्फ एक कार्यालय काम नहीं करता।
वहां President's Secretariat, Armed Forces, civil administration, security agencies और आयोजन से जुड़े कई दूसरे stakeholders हो सकते हैं।
ADC इन अलग-अलग पक्षों के बीच coordination में भूमिका निभाता है ताकि कार्यक्रम निर्धारित protocol के अनुसार सुचारू रूप से हो सके।
राष्ट्रपति के ADC को आप अक्सर राष्ट्रीय और सैन्य समारोहों में देख सकते हैं।
Republic Day, Independence Day, investiture ceremonies, military events और अन्य महत्वपूर्ण राजकीय कार्यक्रमों में ADC की ceremonial presence इस पद की पहचान का हिस्सा है।
ADC का काम ऐसी जगह होता है जहां कैमरे मौजूद हो सकते हैं, देश-विदेश के महत्वपूर्ण लोग मौजूद हो सकते हैं और कार्यक्रमों का national significance हो सकता है।
इसलिए officer का bearing, discipline, turnout, communication और composure बहुत मायने रखता है।
यहीं से मेजर ऋषभ सिंह सांब्याल की कहानी दिलचस्प हो जाती है।
आज जब लोग उन्हें राष्ट्रपति के पूर्व ADC के तौर पर जानते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि Rashtrapati Bhavan तक पहुंचना उनके career का पहला बड़ा पड़ाव नहीं था।
2021 में Captain के रूप में उन्होंने Republic Day Parade में Jat Regiment की contingent का नेतृत्व किया। उनकी टुकड़ी ने Best Marching Contingent Trophy जीती।
इसके बाद उन्होंने 4 Para (Special Forces) के लिए volunteer किया और Special Forces से जुड़ी कठिन selection प्रक्रिया पूरी की। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने Balidaan Badge भी हासिल किया।
फिर उनके career का एक बिल्कुल अलग chapter शुरू हुआ, President's ADC।
यह progression अपने आप में काफी कुछ बताती है।
एक तरफ Republic Day Parade जैसी सार्वजनिक और ceremonial जिम्मेदारी, दूसरी तरफ Special Forces जैसी demanding military role और फिर Rashtrapati Bhavan में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद से जुड़ी जिम्मेदारी।
इसलिए मेजर सांब्याल की कहानी को केवल social media popularity के नजरिए से देखना उनके पूरे military career को छोटा कर देना होगा।
यह सवाल defence aspirants के बीच अक्सर पूछा जाता है।
राष्ट्रपति का ADC बनने के लिए NDA, CDS या UPSC की तरह कोई अलग direct-entry examination नहीं होती।
यह एक सैन्य appointment है, जिसके लिए पहले Armed Forces में officer होना जरूरी होता है।
यानी अगर कोई युवा आज सोच रहा है कि "मुझे President's ADC बनना है", तो उसका पहला लक्ष्य ADC की कोई अलग परीक्षा देना नहीं, बल्कि Armed Forces में एक सक्षम officer बनना होना चाहिए।
Selection में officer का overall professional profile महत्वपूर्ण होता है। इसमें सामान्य तौर पर service record, leadership ability, discipline, conduct, personality, communication skills और protocol-related suitability जैसे पहलू महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
हालांकि ADC selection की पूरी internal प्रक्रिया और सभी मानदंड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होते। इसलिए इंटरनेट पर मिलने वाली किसी fixed "eligibility list" या निश्चित selection percentage को official rule मानना सही नहीं है।
जरूरी नहीं कि हर ADC appointment के लिए एक ही rank या एक ही career stage लागू हो।
अलग-अलग ADC appointments की requirements अलग हो सकती हैं और selection संबंधित Service तथा appointment के अनुसार होता है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि "ADC बनने के लिए हर officer को पहले Major ही बनना होगा।"
असल बात यह है कि officer के पास उस जिम्मेदारी के अनुरूप service experience और proven professional ability होनी चाहिए।
यही वजह है कि ADC appointment को किसी officer के career में एक प्रतिष्ठित responsibility माना जाता है।
अगर आपने राष्ट्रपति के ADC को ध्यान से देखा है, तो उनकी uniform पर एक खास ceremonial पहचान आपका ध्यान खींच सकती है।
इन अधिकारियों की uniform पर दिखाई देने वाली aiguillettes, यानी विशेष braided cords, उनके ADC appointment की पहचान का हिस्सा होती हैं।
यह सिर्फ सजावटी element नहीं है। यह बताता है कि officer एक विशेष official appointment पर है।
यही वजह है कि किसी national ceremony में ADC की मौजूदगी दूर से भी पहचानी जा सकती है।
भारत में ADC सिर्फ राष्ट्रपति के साथ ही नहीं होते।
वरिष्ठ military officers और अन्य उच्च पदों पर भी ADC appointments हो सकती हैं।
लेकिन राष्ट्रपति के ADC की भूमिका का अपना विशेष महत्व है।
क्यों?
क्योंकि यहां officer सीधे भारत के Head of State के official engagements से जुड़ा होता है। राष्ट्रपति के Secretariat की भूमिका constitutional, ceremonial और अन्य State responsibilities से जुड़ी होती है।
राष्ट्रपति के ADC इस बड़े official ecosystem में Armed Forces का एक visible और disciplined link होते हैं।
इसका जवाब केवल "President के साथ काम करने" में नहीं है।
एक officer को इस भूमिका में अपनी military identity के साथ-साथ एक ऐसे environment में काम करना होता है जहां:
इसलिए यह appointment officer की professional maturity और suitability पर भरोसे को भी दर्शाती है।
राष्ट्रपति भवन में 2014 में आयोजित ADC reunion में तत्कालीन राष्ट्रपति ने ADCs को Head of State के "most valued colleagues" के रूप में संबोधित किया था। इस reunion में स्वतंत्र भारत के अलग-अलग राष्ट्रपतियों के साथ सेवा कर चुके पूर्व ADCs भी शामिल हुए थे।
इससे इस पद की institutional legacy का अंदाजा लगाया जा सकता है।
मेजर सांब्याल ने करीब 12 साल की सैन्य सेवा के बाद premature retirement लिया है।
रिटायरमेंट के बाद राष्ट्रपति मुर्मू से उनकी 21 अगस्त 2026 को मुलाकात भी हुई। इसके बाद सामने आई तस्वीरों में उन्हें पूर्व ADC के रूप में देखा गया।
उनके retirement के कारणों को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें सामने आईं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने व्यक्तिगत और पारिवारिक कारणों का उल्लेख किया है और यह भी कहा कि परिवार उनके फैसले के साथ था। हालांकि उनकी retirement की विस्तृत परिस्थितियां सार्वजनिक रूप से पूरी तरह सामने नहीं आई हैं।
इसलिए किसी अनुमान या सोशल मीडिया speculation को निश्चित कारण मानना ठीक नहीं होगा।
इतना जरूर है कि उनका retirement उस समय हुआ जब वह देश के सबसे पहचाने जाने वाले युवा military faces में से एक बन चुके थे।
मेजर सांब्याल के retirement की खबर के बीच 2026 में President's ADC role एक और वजह से चर्चा में रहा।
मेजर नव्या शेखावत भारतीय सेना की पहली महिला officer बनीं जिन्हें राष्ट्रपति का ADC नियुक्त किया गया। उनकी appointment को Armed Forces में महिलाओं की बढ़ती भूमिका के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण milestone माना गया।
इससे पहले मई 2025 में Lieutenant Commander Yashasvi Solanki भारतीय नौसेना से राष्ट्रपति की पहली महिला ADC बनी थीं।
यानी President's ADC की कहानी सिर्फ एक officer की कहानी नहीं है। यह समय के साथ बदलती भारतीय Armed Forces की तस्वीर भी दिखाती है।
अगर आप defence aspirant हैं, तो ADC की भूमिका से एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझी जा सकती है।
हर अच्छी military career सिर्फ battlefield achievements से नहीं बनती।
Leadership कई अलग-अलग रूपों में सामने आती है।
किसी दिन आपको एक contingent lead करना पड़ सकता है।
किसी दूसरे phase में आप demanding operational environment में काम कर सकते हैं।
और किसी stage पर आपको protocol, communication और national-level representation की जिम्मेदारी मिल सकती है।
मेजर ऋषभ सिंह सांब्याल की career journey में यही progression दिखाई देती है—Republic Day Parade में नेतृत्व से Special Forces तक और वहां से Rashtrapati Bhavan तक।
यह journey defence aspirants के लिए एक सीधा संदेश देती है:
आपके career का अगला बड़ा अवसर अक्सर आपकी पिछली जिम्मेदारियों को आप कितनी गंभीरता से निभाते हैं, उससे बनता है।
नहीं।
हालांकि ceremonial duties इस role का दिखाई देने वाला हिस्सा हैं, लेकिन ADC की भूमिका इससे काफी व्यापक है।
एक official engagement को smooth बनाने के लिए coordination, protocol, timing, communication और administrative understanding की जरूरत होती है।
और जब यह जिम्मेदारी राष्ट्रपति के स्तर पर हो, तो professionalism की अपेक्षा और भी अधिक होती है।
इसीलिए किसी ADC को सिर्फ "राष्ट्रपति के साथ दिखाई देने वाला officer" कहना इस role को बहुत छोटा कर देता है।
वह Armed Forces और senior constitutional leadership के बीच एक महत्वपूर्ण professional link का हिस्सा होता है।
कोई एक checklist हर appointment पर लागू हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन इस तरह की जिम्मेदारी के लिए कुछ qualities स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हैं।
Military officer के लिए discipline आधार है, लेकिन ADC की भूमिका में इसका महत्व और बढ़ जाता है।
Civil और military दोनों stakeholders के साथ clear और professional communication जरूरी है।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के official engagements में protocol की जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है।
लंबे कार्यक्रम हों, unexpected changes हों या public attention हो—officer को composed रहना होता है।
ADC कई संवेदनशील official situations के करीब काम करता है। इसलिए discretion अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हर दिन एक जैसा नहीं होता। एक दिन ceremonial function, दूसरे दिन official visit और किसी अन्य दिन military engagement हो सकता है।
ADC की भूमिका भले ही command appointment न हो, लेकिन leadership और decision-making ability फिर भी महत्वपूर्ण रहती है।
सोशल मीडिया ने मेजर ऋषभ सिंह सांब्याल को शायद उनके uniform, personality और President's ADC के रूप में पहचान दिलाई हो।
लेकिन उनकी professional journey को थोड़ा पीछे जाकर देखें तो तस्वीर और बड़ी दिखाई देती है।
एक Sainik School background से NDA और IMA तक का सफर, फिर Indian Army में commission, 2021 में Republic Day Parade contingent का नेतृत्व, 4 Para Special Forces से जुड़ाव और अंततः President's ADC की जिम्मेदारी—यह एक ऐसे career की कहानी है जिसमें अलग-अलग stages पर अलग तरह की जिम्मेदारियां सामने आईं।
और शायद यही इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है।
एक अच्छा officer सिर्फ एक role के लिए तैयार नहीं होता। वह हर नई जिम्मेदारी के साथ खुद को adapt करता है।
मेजर सांब्याल अब Army से बाहर अपने career के अगले chapter की ओर बढ़ चुके हैं। लेकिन उनका सफर एक ऐसे military role पर ध्यान जरूर खींचता है जिसे हम national ceremonies में अक्सर देखते हैं, लेकिन उसके पीछे की जिम्मेदारियों को शायद ही कभी समझते हैं।
Aide-de-Camp सिर्फ राष्ट्रपति के साथ चलने वाला officer नहीं है। यह भरोसे, अनुशासन, professionalism, protocol और जिम्मेदारी से जुड़ी appointment है।
और यही वजह है कि Rashtrapati Bhavan में किसी ADC की मौजूदगी सिर्फ एक ceremonial तस्वीर नहीं होती—वह भारतीय Armed Forces की professionalism और constitutional leadership के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का प्रतिनिधित्व करती है।
मेजर ऋषभ सिंह सांब्याल की journey में आपको सबसे ज्यादा क्या प्रेरित करता है—Republic Day Parade में नेतृत्व, Special Forces तक पहुंचने की चुनौती या President's ADC की जिम्मेदारी?
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जय हिन्द!
राष्ट्रपति का Aide-de-Camp यानी ADC एक commissioned Armed Forces officer होता है, जो राष्ट्रपति के official engagements, ceremonies, protocol और coordination से जुड़ी जिम्मेदारियों में सहायता करता है।
परंपरागत रूप से राष्ट्रपति के पांच ADC होते हैं—तीन भारतीय सेना से, एक भारतीय नौसेना से और एक भारतीय वायु सेना से।
President का ADC बनने के लिए कोई अलग direct-entry परीक्षा नहीं होती। Armed Forces में commissioned officer बनने के बाद service record, leadership, discipline, professional performance और इस जिम्मेदारी के लिए suitability जैसे पहलू महत्वपूर्ण होते हैं।
ADC राष्ट्रपति के official programmes, state ceremonies, military events, investiture ceremonies और official visits के दौरान protocol, coordination और ceremonial responsibilities में सहायता करता है।
Major Rishabh Singh Sambyal पूर्व Indian Army officer हैं, जिन्होंने President Droupadi Murmu के ADC के रूप में सेवा की। इससे पहले उन्होंने 2021 Republic Day Parade में Jat Regiment contingent का नेतृत्व किया और 4 Para (Special Forces) में भी सेवा की।
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