जब गणतंत्र दिवस परेड (Republic Day Parade) में घोड़े पर सवार जवानों की एक शानदार टुकड़ी दिखाई देती है, या राष्ट्रपति भवन (Rashtrapati Bhavan) में किसी बड़े समारोह के दौरान राष्ट्रपति के साथ घुड़सवार जवान नजर आते हैं, तो क्या आपने कभी सोचा है कि ये जवान कौन होते हैं?
ये हैं द प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड (The President’s Bodyguard - PBG)।
नाम से ही काफी कुछ पता चल जाता है। यह राष्ट्रपति की पर्सनल ट्रूप्स (Personal Troops) के रूप में काम करने वाली एक बेहद खास सैन्य इकाई है।
लेकिन इसकी कहानी सिर्फ घोड़ों, परेड और समारोहों तक सीमित नहीं है।
करीब 250 साल से ज्यादा पुरानी विरासत वाली पीबीजी भारतीय सेना की सबसे पुरानी कैवेलरी रेजिमेंट (Cavalry Regiment) और सभी रेजिमेंट्स में सीनियर-मोस्ट (Senior-most) है।
और सबसे दिलचस्प बात?
एक ही रेजिमेंट के जवान घुड़सवार, आर्मर्ड व्हीकल क्रू (Armoured Vehicle Crew) और पैराट्रूपर (Paratrooper) की भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित होते हैं।
यानी पीबीजी को सिर्फ परेड में घोड़े पर सवार जवानों के रूप में देखना इसकी पूरी कहानी नहीं बताता।
पीबीजी की कहानी आज से लगभग ढाई सदियों पहले शुरू होती है।
साल था 1773।
बनारस में गवर्नर्स बॉडीगार्ड (Governor’s Bodyguard) की स्थापना की गई। इसके गठन में बनारस के राजा चेत सिंह ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और 50 घोड़े तथा 50 सैनिक उपलब्ध कराए।
उस समय रेजिमेंट का उद्देश्य युद्ध के दौरान गवर्नर के साथ रहना और शांतिकाल में सेरेमोनियल बॉडीगार्ड (Ceremonial Bodyguard) की भूमिका निभाना था।
इसके बाद समय के साथ रेजिमेंट का नाम और भूमिका बदलती रही।
1774 में यह गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड (Governor General’s Bodyguard) और 1857 में वायसरॉयज बॉडीगार्ड (Viceroy’s Bodyguard) के रूप में जानी गई।
भारत की आजादी तक यह व्यवस्था जारी रही।
यानी आज राष्ट्रपति भवन में दिखाई देने वाली पीबीजी की परंपरा की जड़ें 18वीं सदी तक जाती हैं।
पीबीजी का इतिहास सिर्फ घोड़ों तक सीमित नहीं रहा।
प्रथम विश्व युद्ध (World War I) और द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के दौरान रेजिमेंट को आधुनिक बनाया गया।
1942 में इसे आर्मर्ड पर्सनेल कैरियर्स (Armoured Personnel Carriers - APCs) मिले।
इसके बाद 1944 में इसे 44वीं इंडियन एयरबोर्न डिवीजन (44th Indian Airborne Division) की 44 डिवीजन रिकॉनिसेंस स्क्वाड्रन (44 Division Reconnaissance Squadron) के रूप में नामित किया गया।
इससे रेजिमेंट ने एयरबोर्न कैवेलरी (Airborne Cavalry) की भूमिका भी निभाई।
यानी समय के साथ पीबीजी ने कैवेलरी (Cavalry), आर्मर्ड (Armoured) और एयरबोर्न (Airborne) जैसी अलग-अलग सैन्य भूमिकाएं अपनाईं।
और यही बात इसे समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
यह सिर्फ एक सेरेमोनियल कैवेलरी रेजिमेंट नहीं है।
भारत की आजादी के समय रेजिमेंट का विभाजन हुआ।
घोड़ों, सैनिकों और उपकरणों का आधा हिस्सा गवर्नर जनरल्स बॉडीगार्ड - इंडिया (Governor General’s Bodyguard - India) के लिए रखा गया, जो राष्ट्रपति भवन में तैनात रहा।
बाकी हिस्सा पाकिस्तान चला गया।
फिर आया 1950।
भारत गणतंत्र बना और गवर्नर जनरल के स्थान पर राष्ट्रपति का पद आया।
इसी समय रेजिमेंट को आधिकारिक रूप से द प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड (The President’s Bodyguard) नाम दिया गया।
तब से यह राष्ट्रपति की पर्सनल ट्रूप्स (Personal Troops) के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रही है।
अब कहानी थोड़ी और दिलचस्प हो जाती है।
आमतौर पर पीबीजी को गणतंत्र दिवस परेड (Republic Day Parade), बीटिंग द रिट्रीट (Beating the Retreat) या राष्ट्रपति भवन में होने वाले समारोहों में घोड़ों पर सवार जवानों के रूप में देखा जाता है।
लेकिन रेजिमेंट की जिम्मेदारी इससे कहीं आगे जाती है।
पीबीजी का मैंडेट (Mandate) दो प्रमुख हिस्सों में समझा जा सकता है:
1. सेरेमोनियल रोल (Ceremonial Role)
2. पैराशूट फॉर्मेशन के साथ ऑपरेशनल रोल (Operational Role with a Parachute Formation)
सेरेमोनियल ड्यूटीज़ के लिए रेजिमेंट के पास 99 घोड़े हैं।
वहीं ऑपरेशनल भूमिका के लिए इसे आर्मर्ड व्हीकल्स (Armoured Vehicles) भी अधिकृत हैं।
इसका मतलब है कि पीबीजी के जवानों को अलग-अलग सैन्य कौशल में दक्ष होना पड़ता है।
उन्हें घुड़सवारी आती है, आर्मर्ड व्हीकल्स के साथ काम करना आता है और पैराशूटिंग (Parachuting) के लिए भी प्रशिक्षित किया जाता है।
शांतिकाल में पीबीजी का बड़ा हिस्सा सेरेमोनियल ड्यूटीज़ में दिखाई देता है।
लेकिन यहां भी सिर्फ दिखाई देना ही काम नहीं है।
गणतंत्र दिवस परेड (Republic Day Parade), बीटिंग द रिट्रीट (Beating the Retreat), संसद के दोनों सदनों को राष्ट्रपति के संबोधन (President’s Address) और राष्ट्रपति भवन में होने वाली साप्ताहिक चेंज ऑफ सेरेमोनियल गार्ड (Change of Ceremonial Guard) जैसी महत्वपूर्ण गतिविधियों में पीबीजी हिस्सा लेती है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, रेजिमेंट हर साल करीब 140 सेरेमोनियल परेड और ड्यूटीज़ (Ceremonial Parades and Duties) में हिस्सा लेती है।
इनमें लगभग 70 अवसरों पर जवान घोड़ों पर सवार होकर अपनी भूमिका निभाते हैं।
इसके अलावा पीबीजी को कई महत्वपूर्ण स्टेट और मिलिट्री सेरेमनीज़ (State and Military Ceremonies) में भी देखा जाता है, जैसे:
राजदूतों और हाई कमिश्नर्स (Ambassadors and High Commissioners) द्वारा क्रेडेंशियल्स की प्रस्तुति (Presentation of Credentials)
हेड्स ऑफ स्टेट (Heads of State) की यात्राएं
सिविल और मिलिट्री इन्वेस्टिचर सेरेमनीज़ (Civil and Military Investiture Ceremonies)
प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश के शपथ ग्रहण समारोह (Swearing-in Ceremonies)
राष्ट्रपति के एट-होम कार्यक्रम (At-Home Events)
यानी राष्ट्रपति भवन में होने वाले कई बड़े राष्ट्रीय और राजकीय समारोहों में पीबीजी की मौजूदगी एक महत्वपूर्ण सेरेमोनियल भूमिका निभाती है।
अब एक ऐसी बात, जो परेड देखते समय शायद दिखाई नहीं देती।
सेरेमोनियल यूनिफॉर्म (Ceremonial Uniform) में घोड़े पर सवार जवानों को लंबे समय तक बिल्कुल नियंत्रित और स्थिर मुद्रा बनाए रखनी होती है।
राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कई मौकों पर सैनिक दो से तीन घंटे से भी अधिक समय तक अपनी लांस (Lance) को निश्चित स्थिति में रखते हुए अपनी भूमिका निभाते हैं।
इसके पीछे सिर्फ अच्छा घुड़सवार होना काफी नहीं है।
इसके लिए चाहिए:
यही कारण है कि सेरेमोनियल परेड जितनी सहज दर्शकों को दिखाई देती है, उसके पीछे तैयारी उतनी ही गंभीर होती है।
पीबीजी के जवानों और उनके घोड़ों दोनों को इन प्रदर्शनों के लिए लगातार तैयार किया जाता है।
पीबीजी की कहानी का यह हिस्सा शायद सबसे कम दिखाई देता है।
स्वतंत्रता के बाद भी रेजिमेंट ने कई ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट्स (Operational Deployments) में हिस्सा लिया।
स्वतंत्रता के बाद पीबीजी ने दिल्ली में स्थिरता बनाए रखने और राष्ट्रपति भवन तथा आसपास के क्षेत्रों की सुरक्षा से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाईं।
भारत-चीन संघर्ष के दौरान रेजिमेंट को चुशुल (Chushul) में तैनात किया गया।
भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पीबीजी को गदरा रोड (Gadra Road) में ऑपरेशन एब्लेज (Operation ABLAZE) के तहत तैनात किया गया।
पीबीजी के पैराट्रूपर डिटैचमेंट्स (Paratrooper Detachments) को श्रीलंका में इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (Indian Peace Keeping Force - IPKF) के साथ भेजा गया।
रेजिमेंट के जवानों की सियाचिन ग्लेशियर (Siachen Glacier) में ऑपरेशन मेघदूत (Operation MEGHDOOT) के तहत वार्षिक तैनाती होती रही है।
इसके अलावा पीबीजी के नामित जवान जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और नॉर्थईस्ट (Northeast) के विभिन्न हाई-एल्टीट्यूड एरियाज़ (High-altitude Areas) में भी तैनात होते हैं और आर्मर्ड फॉर्मेशन्स (Armoured Formations) के साथ ऑपरेशन्स में हिस्सा लेते हैं।
इसलिए पीबीजी को केवल राष्ट्रपति भवन की सेरेमोनियल तस्वीरों से समझना इसकी पूरी सैन्य भूमिका को देखने के बराबर नहीं होगा।
अब आते हैं रेजिमेंट के एक और खास सम्मान पर।
पीबीजी को राष्ट्रपति को एस्कॉर्ट (Escort) करते समय दो स्टैंडर्ड्स (Standards) ले जाने की अनुमति है:
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, स्टैंडर्ड ऑफ द बॉडीगार्ड को 1958 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रस्तुत किया था।
उसी वर्ष रेजिमेंटल स्टैंडर्ड भी प्रस्तुत किया गया।
1963 में दोनों स्टैंडर्ड्स को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन द्वारा फिर से प्रस्तुत किया गया।
इसके बाद 16 नवंबर 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा स्टैंडर्ड ऑफ द बॉडीगार्ड को नए रूप में प्रस्तुत किया गया और रेजिमेंटल स्टैंडर्ड को रिन्यू (Renew) किया गया।
अगर पीबीजी की पहचान से जुड़ी सबसे खास चीजों की बात करें, तो प्रेसिडेंट्स सिल्वर ट्रंपेट और ट्रंपेट बैनर (President’s Silver Trumpet and Trumpet Banner) का नाम जरूर आएगा।
पीबीजी को प्रेसिडेंट्स सिल्वर ट्रंपेट और ट्रंपेट बैनर रखने का विशेष अधिकार प्राप्त है।
राष्ट्रपति भवन के अनुसार, यह सम्मान पहली बार 1953 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा बॉडीगार्ड्स को प्रदान किया गया था।
अब तक पीबीजी को यह सम्मान 14 अवसरों पर प्रदान किया जा चुका है।
यही परंपरा पीबीजी को भारतीय सैन्य और सेरेमोनियल इतिहास में एक अलग पहचान देती है।
पीबीजी का घोड़ों से रिश्ता सिर्फ सेरेमोनियल ड्यूटीज़ तक सीमित नहीं है।
रेजिमेंट ने इक्वेस्ट्रियन स्पोर्ट्स (Equestrian Sports) और पोलो (Polo) में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।
2024 में रेजिमेंट ने बेंगलुरु में आर्मी इक्वेस्ट्रियन चैंपियनशिप ट्रॉफी (Army Equestrian Championship Trophy) जीती।
इसके अलावा पीबीजी से जुड़े दो व्यक्तियों को इक्वेस्ट्रियन स्पोर्ट्स और पोलो में योगदान के लिए अर्जुन अवॉर्ड (Arjuna Award) भी मिल चुका है:
ब्रिगेडियर वी.पी. सिंह
कर्नल एच.एस. सोढ़ी, वीएसएम (VSM)
इसके अलावा ऑनरेरी कैप्टन मिल्खा सिंह ने 1982 एशियन गेम्स (Asian Games) में शो जंपिंग (Show Jumping) में गोल्ड मेडल (Gold Medal) जीता था।
ऑनरेरी कैप्टन सज्जन कुमार ने 1993 में शो जंपिंग के पुइसांस (Puissance) इवेंट में 195 सेंटीमीटर का नेशनल रिकॉर्ड (National Record) बनाया था, जो 30 वर्षों तक कायम रहा।
अगली बार जब आप गणतंत्र दिवस परेड में घोड़े पर सवार पीबीजी के जवानों को देखें, तो उस तस्वीर के पीछे की कहानी भी याद रखिए।
यह रेजिमेंट 1773 में शुरू हुई एक लंबी सैन्य परंपरा से निकलकर आज राष्ट्रपति की पर्सनल ट्रूप्स के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
एक तरफ इसके जवान राष्ट्रपति भवन में सेरेमोनियल ड्यूटीज़ निभाते हैं।
दूसरी तरफ यही रेजिमेंट आर्मर्ड व्हीकल्स, पैराशूटिंग और ऑपरेशनल डिप्लॉयमेंट्स से भी जुड़ी हुई है।
घोड़े, परेड, ट्रंपेट और सेरेमोनियल यूनिफॉर्म इसकी पहचान का एक हिस्सा हैं।
लेकिन पीबीजी की पूरी कहानी में इसके पीछे मौजूद मिलिट्री ट्रेनिंग, ऑपरेशनल भूमिका, इक्वेस्ट्रियन स्किल्स और करीब 250 साल की विरासत भी शामिल है।
यही वजह है कि द प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड भारतीय सेना की सबसे अनोखी और ऐतिहासिक रेजिमेंट्स में अपनी अलग पहचान रखती है।
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जय हिंद!
द प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड (The President’s Bodyguard - PBG) भारतीय सेना की हाउसहोल्ड सेरेमोनियल कैवेलरी रेजिमेंट (Household Ceremonial Cavalry Regiment) है, जो राष्ट्रपति भवन में तैनात रहती है और राष्ट्रपति की पर्सनल ट्रूप्स के रूप में कार्य करती है।
इसकी विरासत 1773 में बनारस में स्थापित गवर्नर्स बॉडीगार्ड (Governor’s Bodyguard) से जुड़ी है।
भारत के गणतंत्र बनने के बाद 1950 में रेजिमेंट को आधिकारिक रूप से द प्रेसिडेंट्स बॉडीगार्ड नाम दिया गया।
नहीं। पीबीजी की सेरेमोनियल भूमिका के साथ ऑपरेशनल भूमिका भी है। इसके जवान पैराशूट फॉर्मेशन और आर्मर्ड ऑपरेशन्स से जुड़ी भूमिकाओं के लिए भी प्रशिक्षित होते हैं।
राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पीबीजी के पास सेरेमोनियल ड्यूटीज़ के लिए 99 घोड़े हैं।
यह पीबीजी से जुड़ा एक विशेष प्रेसिडेंशियल ऑनर (Presidential Honour) है। इसे पहली बार 1953 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बॉडीगार्ड्स को प्रदान किया था।
हां। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 1994 से पीबीजी की वार्षिक तैनाती सियाचिन ग्लेशियर में ऑपरेशन मेघदूत के तहत होती रही है।
इसकी खासियत इसकी बहुआयामी भूमिका में है। पीबीजी के जवान सेरेमोनियल कैवेलरी, इक्विटेशन, आर्मर्ड और पैराशूट भूमिकाओं से जुड़े कौशल रखते हैं और साथ ही राष्ट्रपति से जुड़े महत्वपूर्ण राष्ट्रीय समारोहों में भूमिका निभाते हैं।
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