बचपन का वो पल जो ताउम्र याद रहेगा
मेरी उम्र 12 साल है, और ये कहानी तब की है जब मैं सिर्फ 10 साल का था। हो सकता है आपके लिए ये सिर्फ एक story हो, लेकिन मेरे लिए ये मेरी life का ऐसा हिस्सा है, जिसे मैंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया है।
मेरे पापा Indian Army में हैं और मेरी मम्मी housewife हैं। पापा की posting उस time Jammu & Kashmir में थी। हम लोग joint family में रहते हैं – दादाजी भी फौज में थे, दादी housewife थीं। मेरे चाचा एक होटल में काम करते हैं और चाची अपनी दो बेटियों के साथ हमारे साथ ही रहती हैं।
खुशियों की तैयारी
ये बात 2019 की है, February का महीना था। 10 February को Sunday था और मेरी school की छुट्टी थी। सुबह-सुबह पापा का फोन आया – पूरे घर में excitement थी क्योंकि पापा ने casually बातों-बातों में बता दिया था कि इस हफ्ते छुट्टी आ सकते हैं। वैसे पापा कभी अपने आने की खबर जल्दी नहीं देते, पर उस दिन पता चला और सब बहुत खुश थे, खासकर मैं – क्योंकि पापा ने मेरे लिए वहां से एक अच्छा सा bat लाने का promise किया था।
पूरे घर में उत्साह था – दादी ने अगले ही दिन एक kilo दूध extra मंगवा लिया, मम्मी ने भी पूरे घर की safai start कर दी। सब ऐसा feel कर रहे थे जैसे कोई बड़ा त्यौहार आने वाला हो। मम्मी, चाची और दादी घर की धुलाई, पर्दों की धुलाई और समान इधर से उधर करने में लग गए थे।
14 फरवरी 2019 - वो काली तारीख
14 February को मम्मी ने सुबह पापा को call किया, पर फोन नहीं लगा। मम्मी ने सोचा busy होंगे, बाद में call कर लेंगे। मैं भी school चला गया। दोपहर में लौटकर नहा-धोकर खाना खाया और फिर मम्मी के साथ मेरी favourite movie Frozen देखने लगा।
अभी हम movie ही देख रहे थे कि दादी आईं और मम्मी से पूछा – "पापा से बात हुई?" मम्मी ने बताया कि नहीं, सुबह call किया था पर नहीं लगा। दादी ने कहा, "फिर से try कर, बस बात करनी है।"
मम्मी ने कई बार call मिलाया – पर हर बार same message – Not Reachable. मम्मी ने दादी को बताया और दोनों थोड़े परेशान हो गए। फिर मम्मी ने पापा के दोस्तों को भी call किया, लेकिन सबके phones भी unreachable ही आ रहे थे। अब घर का माहौल tense होने लगा था।
Pulwama Attack की खबर और डर का माहौल
शाम होते-होते TV पर news चलने लगी – Pulwama में आतंकी हमला. मम्मी के चेहरे का रंग उड़ गया, हाथ कांपने लगे। मम्मी बार-बार पापा को call कर रही थी, पर फोन अब भी not reachable था। पूरी family के ऊपर जैसे डर और चिंता का साया मंडराने लगा था। दादी और मम्मी दोनों की आंखों में डर साफ दिख रहा था।
3 दिन तक न पापा का फोन आया, न किसी दोस्त का। पूरे घर में सन्नाटा था। खाना बनाना, खाना खाना – सब कुछ बंद सा हो गया था। सिर्फ चाची ने बच्चों के लिए कुछ बनाया, पर मम्मी और दादी ने तो शायद 3 दिन में ठीक से कुछ खाया भी नहीं। दादाजी बार-बार समझाते, "टेंशन मत लो", पर डर तो सबके मन में था।
3 दिन बाद आई वो कॉल
तीसरे दिन शाम को अचानक मम्मी का phone बजा। मम्मी दौड़कर फोन के पास गईं, सोचा शायद पापा का होगा – पर number unknown था। मम्मी ने डरते हुए call उठाया, दूसरी तरफ से आवाज आई – "Hello Mummy!"
पापा की आवाज सुनते ही मम्मी फूट-फूटकर रोने लगीं। दादी ने फोन हाथ में लिया और पापा को डांटने लगीं – "एक फोन तो कर सकते थे ना, पता है यहां सबका क्या हाल है!"
पापा ने बताया कि area में network बंद कर दिया गया था, इसलिए न call कर सकते थे, न receive कर सकते थे। पापा की आवाज सुनकर पूरे घर ने राहत की सांस ली।
हर फौजी की पत्नी, मां और बहन की अपनी लड़ाई
ये तो सिर्फ हमारी कहानी है – लेकिन ऐसे ना जाने कितने घर हैं जहां मां, बहनें और पत्नियां हर रोज अपने डर से लड़ती हैं, खुद को संभालती हैं और पूरे परिवार को संभालती हैं। एक फौजी की मां, पत्नी या बहन होना किसी वीरता से कम नहीं है।
इन वीर नारियों की बहादुरी को अक्सर हम देख नहीं पाते, लेकिन उनकी हिम्मत और सहनशक्ति ही एक soldier को मैदान में डटे रहने की ताकत देती है।
इन बहादुर महिलाओं के लिए Diwali, Holi या Dussehra तब ही होता है जब उनका बेटा या पति घर छुट्टी पर आता है। इनकी खुशियों का कोई अपना calendar नहीं होता – इनका हर दिन इंतजार में बीतता है।
आज मुझे ये कहानी आप सबके साथ शेयर करने का मौका मिला है। मेरी नज़र में ये सब मां, बहनें और पत्नियां ही असली नायिकाएं हैं, जो हर दिन अपने साहस से हमें strength देती हैं।
इन वीर नारियों को मेरा दिल से सलाम।
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जय हिंद!
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