भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई बड़े आंदोलन और महान नेता याद किए जाते हैं। लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी हैं जिनका उल्लेख कम होता है, जबकि उनका प्रभाव बहुत गहरा था।
ऐसी ही एक घटना थी रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह 1946 (Indian Navy Mutiny 1946), जिसे 1946 नौसैनिक विद्रोह या भारतीय नौसेना बगावत भी कहा जाता है। यह विद्रोह 18 फरवरी 1946 को शुरू हुआ और कुछ ही दिनों में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।
यह आंदोलन बॉम्बे (अब मुंबई) स्थित HMIS Talwar से शुरू हुआ। यहाँ तैनात भारतीय नौसैनिक (रेटिंग्स) खराब भोजन, नस्लीय भेदभाव और असमान वेतन से नाराज़ थे।
ब्रिटिश सैनिकों को बेहतर सुविधाएँ और अधिक वेतन मिलता था, जबकि भारतीय सैनिकों को कम वेतन और कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
जब B.C. Dutt को “Quit India” लिखने के कारण गिरफ्तार किया गया, तो नौसैनिकों का आक्रोश और बढ़ गया।
नौसैनिकों पर गहरा प्रभाव पड़ा था:
जो आंदोलन भूख हड़ताल से शुरू हुआ था, वह जल्द ही बड़े पैमाने पर विद्रोह में बदल गया।
सिर्फ 48 घंटों के भीतर:
बॉम्बे में मजदूरों, छात्रों और आम नागरिकों ने भी हड़ताल का समर्थन किया। शहर में सार्वजनिक परिवहन ठप हो गया और हालात तनावपूर्ण हो गए।
हालांकि जनता का समर्थन मिला, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस विद्रोह का खुला समर्थन नहीं किया।
Indian National Congress और All-India Muslim League दोनों ने नौसैनिकों से आत्मसमर्पण करने की अपील की। नेताओं को डर था कि यह सशस्त्र विद्रोह स्वतंत्रता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण में बाधा बन सकता है।
केवल Aruna Asaf Ali और Communist Party of India ने खुलकर समर्थन किया।
इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को यह संदेश दिया कि वे अब भारतीय सेना और नौसेना पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर सकते।
यह पहली बार था जब इतने बड़े पैमाने पर सैन्य बल ने एकजुट होकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी।
इतिहासकार मानते हैं कि इस घटना ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज किया। विद्रोह के कुछ ही समय बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने भारत में कैबिनेट मिशन भेजा।
यह विद्रोह सशस्त्र था और मुख्यधारा के अहिंसक आंदोलन की कहानी से अलग था। शायद इसी कारण इसे उतनी जगह नहीं मिली जितनी अन्य आंदोलनों को मिली।
कुल मिलाकर रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह 1946 केवल वेतन और भोजन का आंदोलन नहीं था। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक मजबूत और साहसिक चुनौती थी।
हालाँकि यह विद्रोह कुछ ही दिनों में दबा दिया गया, लेकिन इसने ब्रिटिश सरकार को यह समझा दिया कि भारत पर उनका नियंत्रण अब स्थायी नहीं है।
यह अध्याय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसे हर भारतीय को जानना और याद रखना चाहिए।
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जय हिंद।


