कल World Radio Day है…
तो हमने सोचा क्यों न आपके लिए उस आवाज़ की कहानी लेकर आएँ, जिसने कभी पूरे देश को एक साथ जोड़े रखा था। वह दौर जब रेडियो हर घर का सुख-दुख का साथी हुआ करता था सुबह की खबरें, दोपहर के गीत, शाम की क्रिकेट कमेंट्री और रात की कहानियाँ।
रेडियो दशकों से हम सबका मनोरंजन करता आया है; कभी रविवार की सुबह बजते बिनाका गीतमाला के गीतों से, कभी क्रिकेट कमेंट्री पर धड़कती धड़कनों से, तो कभी रात के सन्नाटे में सुनाई देनेवाली कहानियों और समाचारों से।
अब ज़रा कल्पना कीजिए उस दौर की, जब न मोबाइल था, न टीवी, न इंटरनेट की लगातार बजती नोटिफिकेशन। तब ख़बरें, संगीत और संदेश हवा में तैरते थे। एक लकड़ी के रेडियो बॉक्स से निकलती आवाज़ पूरे गाँव, छावनी और दूर-दराज़ की सीमाओं तक पहुँच जाती थी।
पर क्या आप जानते हैं भारत में रेडियो सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं था। यह सूचना, रणनीति और भरोसेमंद संचार की रीढ़ बना। खासकर भारतीय सेना के लिए रेडियो का मतलब सिर्फ़ आवाज़ नहीं, बल्कि युद्ध में दिशा, शांति में संपर्क और राष्ट्र निर्माण में एक मजबूत सेतु था; जिसने हर दौर में निर्णायक भूमिका निभाई।
आज जैसे ड्रोन या कोडिंग शौक माने जाते हैं, वैसे ही 1920 के दशक में रेडियो एक चुनिंदा लोगों का जुनून था।
बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास जैसे शहरों में कुछ ब्रिटिश अधिकारी और संपन्न भारतीय अपने ट्रांसमीटर और रिसीवर खुद बनाते थे।
भारतीय सेना का Corps of Signals 1911 में बना। शुरुआत में टेलीग्राफ और वायर कम्युनिकेशन था, लेकिन जल्द ही रेडियो सैन्य संचार का मुख्य माध्यम बन गया।
1936 में Indian State Broadcasting Service का नाम बदलकर All India Radio (AIR) रखा गया। ब्रिटिश सरकार ने BBC से आए Lionel Fielden को पहला कंट्रोलर बनाया।
यह एक औपनिवेशिक उपकरण था, लेकिन इसका ढांचा भविष्य के भारत के लिए बेहद अहम साबित हुआ।
आजादी के बाद भारत को रेडियो सिस्टम नया नहीं बनाना पड़ा। AIR पहले से मौजूद था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में रेडियो का उपयोग बदला:
1971 के भारत-पाक युद्ध में AN/PRC-25 रेडियो सेट का व्यापक इस्तेमाल हुआ। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान:
रेडियो ने साबित किया कि बिना नेटवर्क भी युद्ध जीता जा सकता है—अगर संचार मज़बूत हो।
आज भारतीय सेना पारंपरिक रेडियो से आगे बढ़ चुकी है।
भारतीय सेना अब रेडियो को सिर्फ़ युद्ध तक सीमित नहीं रखती।
उद्देश्य:
भारत में रेडियो की कहानी सिर्फ़ तकनीक की नहीं है। यह कहानी है Signal Corps के अधिकारियों, युद्धक्षेत्र की आवाज़, और राष्ट्र निर्माण के एक मजबूत माध्यम की।
औपनिवेशिक नियंत्रण से लेकर आत्मनिर्भर सैन्य संचार तक—रेडियो नेहर दौर में भारत और भारतीय सेना का साथ निभाया है।
सीमाओं पर तैनात जवानों से लेकर दूर-दराज़ गांवों तक, रेडियो आज भी भरोसे, सूचना और संपर्क का सबसे मज़बूत माध्यम बना हुआ है। तकनीक बदली है, स्वरूप बदला है, लेकिन रेडियो की भूमिका वही रही है।
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जय हिंद!
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