कारगिल की ऊँची चोटियों पर भारतीय सेना सिर्फ़ दुश्मन के सैनिकों से नहीं, बल्कि बर्फ़, खड़ी चट्टानों और बेहद कठिन मौसम से भी लड़ रही थी। लेकिन इस युद्ध में एक ऐसी ताकत थी, जिसने दुश्मन की चौकियों को हिला दिया और भारतीय सैनिकों के लिए जीत का रास्ता बनाया—भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी।
भारतीय सेना की आर्टिलरी को अक्सर “God of War” यानी “युद्ध का देवता” कहा जाता है। कारगिल युद्ध के दौरान इसी आर्टिलरी ने दुश्मन के ठिकानों पर लगभग 2,93,600 गोले दागे, जिससे पाकिस्तान की सप्लाई लाइन और बंकर बुरी तरह तबाह हो गए।
इस युद्ध में कैप्टन जेरी प्रेम राज, गनर एस. गोपाला पिल्लई और मेजर अमरिंदर सिंह कसाना जैसे वीरों ने अद्भुत साहस का परिचय दिया।
भारतीय सेना की रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी सेना की दूसरी सबसे बड़ी लड़ाकू शाखा है। इसकी स्थापना 28 सितंबर 1827 को हुई थी और इसका मुख्य प्रशिक्षण केंद्र, स्कूल ऑफ आर्टिलरी, महाराष्ट्र के देवळाली में स्थित है।
इस रेजिमेंट का आदर्श वाक्य है—
“सर्वत्र इज़्ज़त-ओ-इक़बाल”
जिसका अर्थ है—“हर जगह सम्मान और गौरव।”
आज भारतीय आर्टिलरी के पास बोफोर्स होवित्जर, एम-777 अल्ट्रा-लाइट होवित्जर, के-9 वज्र और पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर जैसे आधुनिक हथियार हैं।
कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन ने ऐसी चोटियों पर कब्ज़ा किया था, जहाँ तक पहुँचना भी बेहद मुश्किल था। भारतीय सेना के जवानों को आगे बढ़ाने के लिए आर्टिलरी ने लगातार फायर सपोर्ट दिया।
करीब तीन महीने तक चले युद्ध में भारतीय तोपखाने ने रोज़ाना औसतन 3,300 गोले दागे। कई जगहों पर बोफोर्स तोपों का इस्तेमाल सीधे दुश्मन के बंकरों पर निशाना साधने के लिए किया गया।
108 मीडियम रेजिमेंट, 141 फील्ड रेजिमेंट और 197 फील्ड रेजिमेंट जैसी यूनिटों ने टोलोलिंग, टाइगर हिल, पॉइंट 5140 और ब्लैक रॉक जैसी चोटियों को वापस हासिल करने में अहम भूमिका निभाई।
केरल के तिरुवनंतपुरम जिले के वेंगनूर गाँव में जन्मे कैप्टन जेरी प्रेम राज शुरू में भारतीय वायुसेना में शामिल हुए थे। बाद में उन्होंने सेना की परीक्षा पास की और 5 सितंबर 1997 को 158 मीडियम रेजिमेंट (सेल्फ-प्रोपेल्ड) में अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त किया।
जल्द ही वे एक गर्वित “गनर” बन गए।
जुलाई 1999 में कारगिल युद्ध अपने निर्णायक दौर में था। टाइगर हिल पर जीत के बाद भारतीय सेना का अगला लक्ष्य था पॉइंट 4875, जो द्रास क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग पर नज़र रखता था।
इस ऑपरेशन में 17 जाट, 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स, 12 महार, 2 नागा और 21 पैरा (स्पेशल फोर्सेज) शामिल थीं।
कैप्टन जेरी प्रेम राज को फ़ॉरवर्ड ऑब्ज़र्वेशन पोस्ट ऑफिसर (FOO) बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी दुश्मन की स्थिति का पता लगाना और आर्टिलरी फायर को निर्देशित करना था।
5–6 जुलाई 1999 की रात, जब 2 नागा की टुकड़ी आगे बढ़ रही थी, कैप्टन जेरी प्रेम राज लगातार दुश्मन की चौकियों की पहचान कर भारतीय तोपों को सटीक निर्देश दे रहे थे।
इसी दौरान दुश्मन के स्नाइपर ने उन्हें गोली मार दी। घायल होने के बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा। कुछ देर बाद मशीनगन की गोलियों से वे फिर घायल हुए, लेकिन आख़िरी सांस तक उन्होंने भारतीय तोपों का मार्गदर्शन किया।
देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले कैप्टन जेरी प्रेम राज को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
गनर सजीव गोपाला पिल्लई का जन्म 20 मई 1974 को केरल के कोल्लम जिले के अवनीश्वरम गाँव में हुआ था। वे 4 फील्ड रेजिमेंट का हिस्सा थे।
कारगिल युद्ध के दौरान उन्हें बटालिक सेक्टर में तैनात किया गया। उनकी भूमिका एक ऑब्ज़र्वेशन पोस्ट असिस्टेंट की थी, जो दुश्मन की गतिविधियों पर नज़र रखता था और तोपखाने को जानकारी देता था।
19 मई 1999 की सुबह, गनर पिल्लई अपनी टीम के साथ बम्प-II क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे। जैसे ही टीम लक्ष्य के करीब पहुँची, दुश्मन ने भारी गोलीबारी शुरू कर दी।
इस हमले में गनर पिल्लई गंभीर रूप से घायल हो गए। लेकिन 16,500 फीट की ऊँचाई, बर्फ़ और तेज़ हवाओं के बीच भी उन्होंने अपने फ़ॉरवर्ड ऑब्ज़र्वेशन ऑफिसर को लगातार तकनीकी जानकारी देना जारी रखा।
दुश्मन के रॉकेट हमले में उन्हें सिर में गंभीर चोट लगी। बाद में उन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
गनर गोपाला पिल्लई की वीरता और कर्तव्यनिष्ठा आज भी भारतीय सेना के जवानों को प्रेरित करती है।
उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले के रिस्याल गाँव में जन्मे मेजर अमरिंदर सिंह कसाना 10 जून 1989 को भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट में शामिल हुए थे।
कारगिल युद्ध के दौरान वे 41 फील्ड रेजिमेंट में बैटरी कमांडर के रूप में तैनात थे।
मेजर कसाना ने 2 राजपूताना राइफल्स, 18 ग्रेनेडियर्स और 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के साथ कई महत्वपूर्ण अभियानों में हिस्सा लिया।
उनकी यूनिट ने टोलोलिंग, हम्प, रॉकी नॉब और पॉइंट 5140 जैसी रणनीतिक चोटियों को वापस हासिल करने में अहम भूमिका निभाई।
12–13 जून 1999 की रात, मेजर कसाना ने अपनी जान की परवाह किए बिना बारूदी सुरंगों वाले क्षेत्र में प्रवेश किया और घायल सैनिकों को सुरक्षित बाहर निकाला।
उनके इस साहसिक कदम ने जवानों का मनोबल बढ़ाया और अगले हमलों की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी बहादुरी और नेतृत्व के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
कारगिल युद्ध की चर्चा अक्सर टाइगर हिल और टोलोलिंग की लड़ाइयों से शुरू होती है, लेकिन इन जीतों के पीछे भारतीय आर्टिलरी की ताकत और गनर्स का साहस छिपा हुआ है।
कैप्टन जेरी प्रेम राज, गनर एस. गोपाला पिल्लई और मेजर अमरिंदर सिंह कसाना जैसे वीरों ने साबित कर दिया कि कभी-कभी जीत सिर्फ़ मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों से नहीं, बल्कि दूर बैठकर दुश्मन पर सटीक वार करने वाले योद्धाओं से भी तय होती है।
अगर आपने अभी तक हमारी Kargil War Series के पिछले भाग नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें। कारगिल विजय की कहानी इन बहादुर सैनिकों के साहस और बलिदान के बिना अधूरी है।
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जय हिन्द!
कारगिल युद्ध में भारतीय आर्टिलरी ने लगभग 2,93,600 गोले दागे और दुश्मन की चौकियों, सप्लाई लाइनों और बंकरों को भारी नुकसान पहुँचाया।
कैप्टन जेरी प्रेम राज भारतीय सेना की 158 मीडियम रेजिमेंट के अधिकारी थे, जिन्हें कारगिल युद्ध में वीरता और बलिदान के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
गनर एस. गोपाला पिल्लई भारतीय सेना की 4 फील्ड रेजिमेंट से थे और उन्होंने बटालिक सेक्टर में बहादुरी दिखाई थी।
मेजर अमरिंदर सिंह कसाना को कारगिल युद्ध में असाधारण साहस और नेतृत्व के लिए वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
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