कारगिल युद्ध केवल कुछ प्रसिद्ध वीरों की कहानी नहीं है। यह उन हजारों भारतीय सैनिकों की गाथा है, जिन्होंने अलग-अलग रेजिमेंटों से आकर एक ही उद्देश्य के लिए लड़ाई लड़ी: भारत की हर इंच भूमि को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराना।
बर्फ से ढकी दुर्गम चोटियां, ऑक्सीजन की कमी, दुश्मन की लगातार गोलाबारी और लगभग सीधी चट्टानों पर चढ़ाई... इन सबके बीच भारतीय सेना की कई रेजिमेंटों ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। कुछ रेजिमेंटों के नाम पूरे देश ने सुने, जबकि कुछ ने बिना किसी शोर-शराबे के ऐसे पराक्रम किए, जिन्होंने ऑपरेशन विजय की सफलता की नींव रखी।
कारगिल सीरीज़ के इस भाग में हम जानेंगे राजपूताना राइफल्स, राजपूत रेजिमेंट, बिहार रेजिमेंट और नागा रेजिमेंट की गौरवशाली विरासत और उन वीर सैनिकों के बारे में, जिन्होंने कारगिल की चोटियों पर अपने साहस से इतिहास रच दिया।
10 जनवरी 1775 को स्थापित राजपूताना राइफल्स भारतीय सेना की सबसे पुरानी और पहली राइफल रेजिमेंट मानी जाती है। लगभग ढाई सौ वर्षों से यह रेजिमेंट भारत की सीमाओं की रक्षा कर रही है। इसका आदर्श वाक्य "वीर भोग्या वसुंधरा" और युद्ध उद्घोष "राजा रामचंद्रजी की जय" आज भी इसके सैनिकों में वही जोश और परंपरा जीवित रखते हैं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर स्वतंत्र भारत के लगभग हर बड़े सैन्य अभियान तक, इस रेजिमेंट ने अपनी वीरता का परिचय दिया है।
कारगिल युद्ध के दौरान 2 राजपूताना राइफल्स को द्रास सेक्टर की रणनीतिक तोलोलिंग चोटी पर कब्जा करने का कठिन दायित्व सौंपा गया। दुश्मन ऊंचाई पर मजबूत स्थिति में था, लेकिन भारतीय सैनिकों ने कठिन चढ़ाई और भारी गोलाबारी के बीच हमला जारी रखा। तोलोलिंग पर मिली जीत ने पूरे कारगिल अभियान की दिशा बदल दी और भारतीय सेना का मनोबल कई गुना बढ़ा दिया। यह ऑपरेशन आज भी भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण सफलताओं में गिना जाता है।
1778 में स्थापित राजपूत रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे पुरानी और सबसे अधिक सम्मानित पैदल सेना रेजिमेंटों में से एक है। इसका रेजिमेंटल सेंटर उत्तर प्रदेश के फतेहगढ़ में स्थित है। "सर्वत्र विजय" इसका आदर्श वाक्य है, जबकि इसका युद्ध उद्घोष "बोल बजरंग बली की जय" सैनिकों में अदम्य उत्साह भरता है। इस रेजिमेंट ने स्वतंत्रता के बाद भारत के लगभग हर प्रमुख युद्ध और सैन्य अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
कारगिल युद्ध के दौरान 27 राजपूत ने अपनी असाधारण बहादुरी से इतिहास रच दिया। बटालियन को रणनीतिक पॉइंट 5770 पर कब्जा करने की जिम्मेदारी मिली। कर्नल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) कोमसाम हिमालय सिंह के नेतृत्व में सैनिकों ने लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर रात के अंधेरे में चढ़ाई कर दुश्मन को चौंका दिया। इस साहसिक अभियान में भारतीय सेना ने बिना किसी सैनिक को खोए लक्ष्य हासिल किया। बाद में इस चोटी का नाम नवदीप टॉप रखा गया।
15 सितंबर 1941 को स्थापित बिहार रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित इन्फैंट्री रेजिमेंटों में से एक है। इसका रेजिमेंटल सेंटर दानापुर छावनी (पटना) में स्थित है। अपनी स्थापना के बाद से इस रेजिमेंट ने कई युद्धों और अभियानों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है तथा अनुशासन और साहस की मिसाल पेश की है।
कारगिल युद्ध के दौरान 1 बिहार ने बटालिक सेक्टर में बेहद कठिन परिस्थितियों में लड़ाई लड़ी। ऊंची पहाड़ियों पर बैठे दुश्मन को चुनौती देते हुए सैनिकों ने अद्वितीय साहस दिखाया। इस उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए बिहार रेजिमेंट को 'बैटल ऑनर बटालिक' और 'थिएटर ऑनर कारगिल' से सम्मानित किया गया। बटालिक में इस रेजिमेंट का योगदान ऑपरेशन विजय की सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
1 नवंबर 1970 को स्थापित नागा रेजिमेंट भारतीय सेना की अपेक्षाकृत नई इन्फैंट्री रेजिमेंट है। इसका रेजिमेंटल सेंटर उत्तराखंड के रानीखेत में स्थित है। "पराक्रमो विजयते" इसका आदर्श वाक्य है और इसके सैनिक अपनी उत्कृष्ट पर्वतीय एवं जंगल युद्ध क्षमता के लिए जाने जाते हैं। इस रेजिमेंट में नागा समुदाय के साथ-साथ कुमाऊं, गढ़वाल और गोरखा समुदायों के सैनिक भी शामिल हैं।
कारगिल युद्ध के दौरान 1 नागा उन शुरुआती बटालियनों में शामिल थी जिन्हें द्रास सेक्टर में तैनात किया गया। कठिन मौसम, दुर्गम पहाड़ियों और लगातार दुश्मन की गोलाबारी के बावजूद सैनिकों ने अपने साहस और धैर्य का परिचय दिया। नजदीकी लड़ाई में उनके पराक्रम ने नागा रेजिमेंट को भारतीय सेना की सबसे प्रभावशाली पर्वतीय युद्ध इकाइयों में शामिल कर दिया।
कारगिल युद्ध की जीत किसी एक रेजिमेंट या एक बटालियन की नहीं थी। यह भारतीय सेना की उस अद्भुत एकता का परिणाम थी, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए सैनिकों ने एक ही तिरंगे के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।
राजपूताना राइफल्स की गौरवशाली विरासत, राजपूत रेजिमेंट का अदम्य साहस, बिहार रेजिमेंट का सर्वोच्च बलिदान और नागा रेजिमेंट का पराक्रम हमें याद दिलाता है कि भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत उसके सैनिकों का जज़्बा, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण है।
कारगिल की इन वीर गाथाओं ने केवल पहाड़ नहीं जीते, बल्कि पूरे देश का विश्वास भी जीता। आज भी इन रेजिमेंटों के शौर्य की कहानियां हर भारतीय को गर्व, प्रेरणा और राष्ट्रसेवा की भावना से भर देती हैं।
यदि आपने हमारी Kargil War Series के Part 1, Part 2, Part 3 और Part 4 अभी तक नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें भी अवश्य पढ़ें। कारगिल विजय की पूरी कहानी इन्हीं वीरों के साहस और बलिदान से मिलकर बनती है।
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जय हिन्द!
इस भाग में राजपूताना राइफल्स, राजपूत रेजिमेंट, बिहार रेजिमेंट और नागा रेजिमेंट की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। इन सभी रेजिमेंटों ने कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन विजय में महत्वपूर्ण योगदान दिया और कई वीर सैनिकों ने असाधारण साहस का परिचय दिया।
1775 में स्थापित राजपूताना राइफल्स भारतीय सेना की सबसे पुरानी और पहली राइफल रेजिमेंट है। लगभग ढाई सौ वर्षों से यह रेजिमेंट भारत की सेवा कर रही है और अनेक युद्धों तथा सैन्य अभियानों में अपनी वीरता साबित कर चुकी है।
कारगिल युद्ध के दौरान 27 राजपूत ने रणनीतिक पॉइंट 5770 पर सफलतापूर्वक कब्जा किया। बाद में इस चोटी का नाम नवदीप टॉप रखा गया। यह ऑपरेशन ऑपरेशन विजय के सबसे साहसिक अभियानों में से एक माना जाता है।
1 बिहार ने कारगिल युद्ध के बटालिक सेक्टर में अद्भुत वीरता का परिचय दिया। इसके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए रेजिमेंट को 'बैटल ऑनर बटालिक' और 'थिएटर ऑनर कारगिल' से सम्मानित किया गया।
1 नागा उन शुरुआती बटालियनों में शामिल थी जिन्हें द्रास सेक्टर में तैनात किया गया था। कठिन परिस्थितियों और लगातार दुश्मन की गोलाबारी के बीच इस बटालियन ने साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया तथा इसके कई सैनिकों को वीरता पुरस्कार मिले।
इस लेख में शामिल वीर चक्र विजेताओं में कैप्टन हनीफुद्दीन, नायब सूबेदार मंगेज सिंह, कैप्टन श्यामल सिन्हा, हवलदार जोगिंदर सिंह, मेजर एम. सरवनन, नायक गणेश प्रसाद यादव, लांस नायक खुशिमान गुरूंग और सिपाही के. अशुली शामिल हैं।
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