जून 1999।
द्रास, कारगिल और बटालिक की बर्फीली चोटियों पर सिर्फ गोलियां नहीं चल रही थीं।
वहां भारत के सैनिक अपने साहस, धैर्य और बलिदान से इतिहास लिख रहे थे।
कारगिल युद्ध की कहानी सिर्फ टाइगर हिल या पॉइंट 4875 की नहीं है। यह उन रेजिमेंटों की भी कहानी है जिन्होंने लगभग असंभव लगने वाले मिशनों को पूरा किया और भारत को विजय दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
इस श्रृंखला के तीसरे भाग में हम जानेंगे तीन ऐसी महान इकाइयों के बारे में जिन्होंने कारगिल युद्ध में अपनी वीरता से अमर स्थान बना लिया:
• 1/11 गोरखा राइफल्स
• 2 राजपूताना राइफल्स
• लद्दाख स्काउट्स
भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित और भयभीत करने वाली इन्फैंट्री रेजिमेंटों में गोरखा राइफल्स का नाम सबसे ऊपर आता है।
उनका युद्धघोष— “जय महाकाली, आयो गोरखाली”
सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि युद्धभूमि में दुश्मन के लिए चेतावनी माना जाता है।
गोरखा सैनिक अपनी बहादुरी, पर्वतीय युद्ध कौशल और प्रसिद्ध खुकरी के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं।
उनका आदर्श वाक्य है: “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो”
अर्थात: “कायर बनकर जीने से बेहतर है वीरता से मर जाना।”
कारगिल युद्ध में 1/11 गोरखा राइफल्स ने दुर्गम पहाड़ियों और दुश्मन की मजबूत चौकियों पर साहसिक हमले किए।
इस बटालियन ने ऐसे नेतृत्व को जन्म दिया जिसने पूरे देश को प्रेरित किया।
• लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय, परम वीर चक्र (PVC)
• कर्नल ललित राय, वीर चक्र (VrC)
कारगिल युद्ध का इतिहास लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय के बिना अधूरा है।
जब उनकी टुकड़ी को दुश्मन के कई बंकरों पर कब्जा करने का आदेश मिला, तब उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर हमला किया। भारी गोलाबारी के बीच उन्होंने एक-एक करके दुश्मन की चौकियों को नष्ट किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वे आगे बढ़ते रहे और अपने साथियों का नेतृत्व करते रहे।
अंततः उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया लेकिन मिशन पूरा कर दिखाया।
उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परम वीर चक्र (PVC) प्रदान किया गया।
कारगिल के कठिन अभियानों में 1/11 गोरखा राइफल्स का नेतृत्व करने वाले अधिकारियों में कर्नल ललित राय का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है। उनकी नेतृत्व क्षमता और युद्धक निर्णयों ने कई अभियानों को सफलता तक पहुंचाया।
उनकी वीरता के लिए उन्हें वीर चक्र (VrC) से सम्मानित किया गया।
कारगिल युद्ध के शुरुआती दिनों में भारतीय सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—टोलोलिंग। यह केवल एक पहाड़ी नहीं थी। यह राष्ट्रीय राजमार्ग NH-1A पर नजर रखने वाली एक रणनीतिक ऊंचाई थी। जब तक टोलोलिंग दुश्मन के कब्जे में थी, भारत की सैन्य आपूर्ति खतरे में बनी हुई थी।
इस कठिन मिशन की जिम्मेदारी मिली 2 राजपूताना राइफल्स (2 RAJ RIF) को।
कर्नल एम.बी. रविंद्रनाथ के नेतृत्व में जवानों ने खड़ी चट्टानों और खुली ढलानों पर रात के अंधेरे में चढ़ाई शुरू की।
दुश्मन ऊपर था। भारतीय सैनिक नीचे। दुश्मन के पास तैयार बंकर थे। भारतीय सैनिकों के पास केवल साहस और संकल्प। कई दिनों तक चली भीषण लड़ाई के बाद 13 जून 1999 को टोलोलिंग पर भारतीय तिरंगा फहराया गया। यह कारगिल युद्ध की पहली बड़ी रणनीतिक जीतों में से एक थी।
कई सैन्य इतिहासकार इसे वह मोड़ मानते हैं जिसने पूरे युद्ध की दिशा बदल दी।
कारगिल युद्ध में इस बटालियन ने असाधारण बलिदान दिए।
इनमें प्रमुख नाम हैं:
• मेजर विवेक गुप्ता (मरणोपरांत)
• मेजर पद्मपाणि आचार्य (मरणोपरांत)
• कैप्टन नेइकेझाखुओ केंगुरुसे (मरणोपरांत)
• नायक दिगेंद्र कुमार
• कर्नल एम.बी. रविंद्रनाथ
• मेजर मोहित सक्सेना
• कैप्टन विजयंत थापर (मरणोपरांत)
• सूबेदार भंवर लाल (मरणोपरांत)
• हवलदार सुल्तान सिंह नरवरिया (मरणोपरांत)
• राइफलमैन जय राम सिंह
टोलोलिंग की जीत के बाद इसी बटालियन ने थ्री पिम्पल रिजलाइन, एरिया नोल और ब्लैक रॉक कॉम्प्लेक्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर भी कब्जा किया।
अगर कारगिल की पहाड़ियों की बात हो और लद्दाख स्काउट्स का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। भारतीय सेना की यह विशिष्ट रेजिमेंट दुनिया के सबसे कठिन युद्धक्षेत्रों में काम करने के लिए जानी जाती है। इन्हें अक्सर कहा जाता है: “Snow Warriors” और “Snow Leopards”
क्योंकि ये सैनिक उन ऊंचाइयों पर लड़ते हैं जहां सामान्य व्यक्ति का सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है।
इस रेजिमेंट की सबसे बड़ी ताकत है इसके सैनिक।
इनकी भर्ती मुख्य रूप से स्थानीय लद्दाखी और तिब्बती समुदायों से होती है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पले-बढ़े होने के कारण इनके शरीर स्वाभाविक रूप से कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंडे वातावरण के अनुकूल होते हैं।
यही कारण है कि कारगिल युद्ध में उन्होंने महत्वपूर्ण टोही अभियानों, अग्रिम चौकियों की सुरक्षा और दुश्मन की गतिविधियों की पहचान में अहम भूमिका निभाई।
लद्दाख स्काउट्स के अनेक सैनिकों ने असाधारण साहस का परिचय दिया।
इनमें प्रमुख नाम हैं:
• मेजर सोनम वांगचुक
• सूबेदार चेरिंग स्टोबदान
• सूबेदार लोबजांग छोटक (मरणोपरांत)
• हवलदार त्सेवांग रिगजिन (मरणोपरांत)
• सिपाही त्सेरिंग दोरजे
कारगिल युद्ध में इनके योगदान ने एक बार फिर साबित किया कि हिमालय की रक्षा करने वाले इन सैनिकों को "Snow Warriors" क्यों कहा जाता है।
कारगिल युद्ध को अक्सर कुछ प्रसिद्ध चोटियों और लड़ाइयों के माध्यम से याद किया जाता है।
लेकिन वास्तविक विजय उन हजारों सैनिकों की थी जिन्होंने नाम, पहचान और व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर राष्ट्र को रखा।
इन तीनों इकाइयों की वीरता ने Operation Vijay को विजय बनाया।
और यही कारण है कि कारगिल की कहानी आज भी भारतीय सेना की सबसे प्रेरणादायक गाथाओं में गिनी जाती है।
यदि आपने हमारी कारगिल युद्ध श्रृंखला के Part 1 और Part 2 अभी तक नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें भी ज़रूर पढ़ें।
जय हिन्द!
इस बटालियन ने कई महत्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया और लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय जैसे परम वीर चक्र विजेता अधिकारी दिए।
13 जून 1999 को 2 राजपूताना राइफल्स ने टोलोलिंग पर कब्जा कर भारतीय सेना को महत्वपूर्ण रणनीतिक सफलता दिलाई।
कारगिल युद्ध में असाधारण वीरता के लिए उन्हें महावीर चक्र प्रदान किया गया।
वे अत्यधिक ऊंचाई और ठंड वाले क्षेत्रों में युद्ध संचालन के विशेषज्ञ हैं और मुख्य रूप से स्थानीय लद्दाखी समुदाय से भर्ती होते हैं।
उन्हें कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान और अद्वितीय साहस के लिए मरणोपरांत परम वीर चक्र प्रदान किया गया।
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