मई और जून 1999।
कारगिल की ऊंची चोटियों पर लड़ाई केवल जमीन के लिए नहीं लड़ी जा रही थी। यह लड़ाई विश्वास, साहस और बलिदान की थी। दुश्मन ऊंचाइयों पर बैठा था। भारतीय सैनिकों को लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़कर हमला करना था।
ऑक्सीजन कम थी।
तापमान शून्य से नीचे था।
लेकिन भारतीय सैनिकों का हौसला हर कठिनाई से ऊंचा था।
कारगिल युद्ध की कई प्रसिद्ध कहानियां आज भी याद की जाती हैं, लेकिन कुछ रेजिमेंटों का योगदान उतना चर्चा में नहीं आया जितना आना चाहिए था। इस श्रृंखला के चौथे भाग में हम जानेंगे तीन ऐसी इकाइयों की कहानी जिन्होंने दुर्गम पहाड़ों पर अद्भुत शौर्य का परिचय दिया:
• 12 जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (12 JAK LI)
• 18 गढ़वाल राइफल्स
• 17 जाट
जब कारगिल में घुसपैठ का पता चला, तब सबसे पहले स्थिति की गंभीरता को समझने वालों में जम्मू एंड कश्मीर लाइट इन्फैंट्री के सैनिक भी शामिल थे।
यह कोई साधारण रेजिमेंट नहीं है।
1947-48 के युद्ध के दौरान स्थानीय स्वयंसेवकों से बनी यह इकाई बाद में भारतीय सेना की नियमित इन्फैंट्री रेजिमेंट बनी। आज JAK LI भारतीय सेना की सबसे सम्मानित और सबसे अधिक वीरता पुरस्कार पाने वाली रेजिमेंटों में गिनी जाती है।
इसका आदर्श वाक्य है: "बलिदानम् वीर लक्षणम्"
अर्थात, "बलिदान वीरों की पहचान है।"
कारगिल युद्ध के दौरान JAK LI के सैनिकों ने दुर्गम पहाड़ियों, बर्फीले दर्रों और दुश्मन की मजबूत चौकियों के बीच असाधारण साहस दिखाया।
11 जून 1999।
बटालिक सेक्टर।
लगभग 17,400 फीट की ऊंचाई। दुश्मन की एक मजबूत चौकी भारतीय सैनिकों को भारी नुकसान पहुंचा रही थी। स्थिति गंभीर थी। तभी एक अनुभवी सैनिक आगे आया।
नाम था: सूबेदार बहादुर सिंह।
करीब 28 वर्षों की सेवा पूरी कर चुके सूबेदार बहादुर सिंह ने स्वयं दुश्मन की उस चौकी को नष्ट करने का जिम्मा लिया।
दो सैनिकों के साथ उन्होंने ऐसी पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू की जहां कोई प्राकृतिक आड़ नहीं थी। दुश्मन ऊंचाई पर था। मशीनगनें लगातार आग उगल रही थीं। लेकिन सूबेदार बहादुर सिंह आगे बढ़ते रहे। दुश्मन ने उनकी टुकड़ी को देख लिया।
भीषण गोलीबारी शुरू हो गई। गोली लगने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने जवाबी फायर करते हुए दो दुश्मन सैनिकों को मार गिराया। दूसरी गोली लगने तक वे लड़ते रहे।
आखिरकार उन्होंने राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
• लेफ्टिनेंट के. क्लिफर्ड नोंगरम, महावीर चक्र (MVC)
• कैप्टन अमोल कालिया, वीर चक्र (VrC)
• सूबेदार बहादुर सिंह, वीर चक्र (VrC)
• लांस नायक घोसे मोहम्मद खान, वीर चक्र (VrC)
कारगिल युद्ध में कुछ लड़ाइयां ऐसी थीं जिनके बिना अंतिम विजय की कल्पना नहीं की जा सकती। पॉइंट 4700 उनमें से एक था। द्रास सेक्टर में स्थित यह ऊंचाई राष्ट्रीय राजमार्ग और आसपास के क्षेत्र पर महत्वपूर्ण नजर रखती थी। इसे वापस लेना आवश्यक था।
यह जिम्मेदारी मिली: 18 गढ़वाल राइफल्स को।
28 जून 1999 की रात। भारतीय सैनिक चुपचाप आगे बढ़ रहे थे। दुश्मन पहले से तैयार था। तोपखाने और मशीनगनों से लगातार फायर हो रहा था।
लेकिन गढ़वाल राइफल्स के जवान रुकने वाले नहीं थे। भीषण संघर्ष और हाथापाई के बाद भारतीय सैनिकों ने पॉइंट 4700 और टॉमी फीचर पर कब्जा कर लिया।
यह सफलता आगे की कई महत्वपूर्ण कार्रवाइयों की नींव बनी।
• मेजर राजेश साह, वीर चक्र
• कैप्टन सुमीत रॉय, वीर चक्र (मरणोपरांत)
• कैप्टन एम. वी. सूरज, वीर चक्र
• नायक कश्मीर सिंह, वीर चक्र (मरणोपरांत)
• राइफलमैन अनुसूया प्रसाद, वीर चक्र (मरणोपरांत)
• राइफलमैन कुलदीप सिंह, वीर चक्र (मरणोपरांत)
इन वीरों के साहस ने 18 गढ़वाल राइफल्स को कारगिल के सबसे सम्मानित बटालियनों में शामिल कर दिया।
कारगिल युद्ध में मशकोह घाटी सबसे कठिन युद्धक्षेत्रों में से एक थी। यहीं पर 17 जाट ने अपनी वीरता का ऐसा प्रदर्शन किया जिसे आज भी सैन्य इतिहास में सम्मान के साथ याद किया जाता है।
इस बटालियन को दुश्मन द्वारा कब्जाए गए महत्वपूर्ण ठिकानों को वापस लेने का कार्य सौंपा गया। ऊंची पहाड़ियां, खुला इलाका और लगातार गोलाबारी। हर कदम मौत के साये में उठाया जा रहा था।
लेकिन 17 जाट ने पीछे हटना नहीं सीखा था।
• कर्नल उमेश सिंह बावा, वीर चक्र
• मेजर दीपक रामपाल, वीर चक्र
• हवलदार कुमार सिंह, वीर चक्र (मरणोपरांत)
इन वीर सैनिकों ने कठिन परिस्थितियों में असाधारण नेतृत्व और साहस का परिचय दिया।
जब कारगिल युद्ध की बात होती है तो अक्सर टाइगर हिल और टोलोलिंग जैसे नाम सबसे पहले याद आते हैं।
लेकिन विजय की नींव उन सैनिकों ने रखी थी जिन्होंने दूर-दराज की चोटियों, संकरी रिजलाइन और दुर्गम घाटियों में लड़ाई लड़ी:
12 JAK LI ने दिखाया कि स्थानीय ज्ञान और साहस मिलकर क्या कर सकते हैं।
18 गढ़वाल राइफल्स ने असंभव लगने वाली ऊंचाइयों को जीतकर इतिहास रचा।
17 जाट ने मशकोह घाटी में अद्भुत दृढ़ता का प्रदर्शन किया।
इनकी वीरता ने साबित किया कि कारगिल की जीत केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी।
यह भारतीय सैनिक के अदम्य साहस की विजय थी।
यदि आपने हमारी Kargil War Series के Part 1, Part 2 और Part 3 अभी तक नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें भी अवश्य पढ़ें। कारगिल विजय की पूरी कहानी इन्हीं वीरों के साहस और बलिदान से मिलकर बनती है।
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जय हिन्द!
इस रेजिमेंट ने बटालिक सेक्टर में महत्वपूर्ण अभियानों का नेतृत्व किया और कई वीरता पुरस्कार प्राप्त किए।
11 जून 1999 को असाधारण साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र प्रदान किया गया।
18 गढ़वाल राइफल्स ने पॉइंट 4700 और उससे जुड़े महत्वपूर्ण फीचर्स पर कब्जा किया।
17 जाट ने मुख्य रूप से मशकोह घाटी क्षेत्र में महत्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया।
"बलिदानम् वीर लक्षणम्" — अर्थात बलिदान वीरों की पहचान है।
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