अशोक चक्र विजेता मेजर सुधीर कुमार वालिया भारतीय सेना के 9 पैरा एसएफ के सबसे चर्चित स्पेशल फोर्सेस ऑफिसर्स में गिने जाते हैं। कारगिल वॉर के बाद कुपवाड़ा के हफरूदा फॉरेस्ट में उन्होंने घायल होने के बावजूद अपने ट्रूप्स को रेडियो पर निर्देश देते हुए आखिरी सांस तक ऑपरेशन लीड किया।
घना जंगल बिल्कुल शांत नहीं था। हफरूदा फॉरेस्ट की ऊंची घासों और भीगी मिट्टी के बीच कहीं हल्की आवाजें आ रही थीं। सुबह के लगभग साढ़े आठ बजे थे। विजिबिलिटी साफ नहीं थी। सामने कौन है… कितने लोग हैं… कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
लेकिन मेजर सुधीर कुमार वालिया समझ चुके थे कि कुछ बड़ा छिपा हुआ है।
उन्होंने अपने साथी के साथ धीरे-धीरे अपहिल क्रॉल करना शुरू किया। कुछ ही सेकंड बाद उन्हें दो आर्म्ड मिलिटेंट्स दिखाई दिए। दूरी मुश्किल से चार मीटर।
फिर जो हुआ… वह इंडियन आर्मी स्पेशल फोर्सेस हिस्ट्री का हिस्सा बन गया।
गोलियां चलीं। पहला मिलिटेंट वहीं गिर गया। दूसरा हाइडआउट की तरफ भागा। और उसके बाद मेजर वालिया बिना रुके सीधे उस हाइडआउट की तरफ दौड़ पड़े… जबकि अंदर लगभग बीस आतंकवादी छिपे थे।
कुछ मिनट बाद वह गंभीर रूप से घायल थे।
लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी।
उनकी उंगलियां अब भी रेडियो सेट पकड़े हुए थीं।
बनूरी गांव, पालमपुर। हिमाचल प्रदेश का शांत पहाड़ी इलाका। लेकिन इसी गांव से एक ऐसा लड़का निकला जिसने आगे चलकर इंडियन आर्मी स्पेशल फोर्सेस की सबसे चर्चित कहानियों में अपना नाम दर्ज कराया।
हालांकि उनका जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ था, क्योंकि उनके पिता सूबेदार मेजर रूलिया राम वालिया आर्मी में थे। घर में यूनिफॉर्म कोई नई चीज नहीं थी। लेकिन सुधीर वालिया के लिए यह सिर्फ प्रोफेशन नहीं था। यह एक डायरेक्शन बन चुका था।
उन्होंने शुरुआती पढ़ाई गवर्नमेंट स्कूल बनूरी से की और फिर हिमाचल प्रदेश के सैनिक स्कूल सुजानपुर टिहरा पहुंचे। वहीं से आर्म्ड फोर्सेस के प्रति उनका झुकाव और मजबूत हुआ।
कहते हैं कि कुछ लोग एनडीए की तैयारी करते हैं।
और कुछ लोग बचपन से उसी जिंदगी के लिए बने होते हैं।
1984 में उन्होंने एनडीए एग्जाम फर्स्ट अटेम्प्ट में क्लियर किया।
Gallantryawards.gov के अनुसार एनडीए के दौरान ही उनकी पहचान एक बेहद डिसिप्लिन्ड, फिजिकली टफ और मेंटली एग्रेसिव कैडेट के रूप में बनने लगी थी। 30 मई 1987 को वह एनडीए के 72वें कोर्स से पास आउट हुए और फिर इंडियन मिलिट्री अकैडमी पहुंचे।
आईएमए में वह करियप्पा बटालियन की संग्रो कंपनी का हिस्सा थे। 11 जून 1988 को मात्र 20 साल की उम्र में उन्हें इंडियन आर्मी में कमीशन मिला। उनकी पहली यूनिट थी — 4 जाट।
लेकिन असली मोड़ अभी बाकी था।
कमीशनिंग के कुछ ही समय बाद उनकी यूनिट को श्रीलंका भेजा गया। यह वह दौर था जब इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानी आईपीकेएफ वहां डिप्लॉयमेंट पर थी। करीब 70,000 भारतीय सैनिक उस मिशन का हिस्सा बने थे।
श्रीलंका के डेंस जंगल ऑपरेशंस, एम्बुश, अनसर्टेन टेरेन और गुरिल्ला वॉरफेयर ने युवा ऑफिसर सुधीर वालिया को बदल दिया। यहीं उन्होंने पहली बार 9 पैरा एसएफ के सोल्जर्स को करीब से काम करते देखा।
और शायद उसी समय उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें भी स्पेशल फोर्सेस जॉइन करनी है।
9 PARA (Special Forces) भारतीय सेना की सबसे प्रतिष्ठित स्पेशल फोर्सेस यूनिट्स में गिनी जाती है। 1966 में रेज़ हुई यह यूनिट माउंटेन वॉरफेयर, कोवर्ट मिशंस, काउंटर इंसर्जेंसी और हाई-रिस्क ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है।
पैरा एसएफ सिलेक्शन खुद में एक ब्रूटल प्रोसेस माना जाता है। स्लीप डेप्रिवेशन, एंडलेस मार्चेस, साइकोलॉजिकल प्रेशर, एक्सट्रीम सर्वाइवल ड्रिल्स — कई सोल्जर्स सिलेक्शन फेज में ही बाहर हो जाते हैं। लेकिन सुधीर वालिया सिर्फ सिलेक्ट ही नहीं हुए। वह जल्द ही यूनिट के सबसे रिस्पेक्टेड ऑपरेटर्स में गिने जाने लगे।
1990 का कश्मीर सिर्फ हेडलाइंस का हिस्सा नहीं था।
घने जंगल, हिडन मिलिटेंट हाइडआउट्स, पुअर विजिबिलिटी, अनप्रेडिक्टेबल एम्बुश — यह पूरी तरह शैडो वॉरफेयर बन चुका था। स्पेशल फोर्सेस ऑपरेटर्स कई बार मिलिटेंट डिस्गाइज में ऑपरेशंस करते थे। उन्हें टेरेन से ज्यादा खतरा अनसर्टेनिटी से होता था।
किस मोड़ पर फायरिंग शुरू हो जाए… कोई नहीं जानता था। इसी दौर में मेजर वालिया ने कई डेंजरस ऑपरेशंस लीड किए। 1993 में राजौरी डिस्ट्रिक्ट के कांडी विलेज ऑपरेशन में उन्होंने तीन हार्डकोर मिलिटेंट्स को खत्म किया। इस गैलेंट्री के लिए उन्हें सेना मेडल दिया गया।
मेजर वालिया ने सिर्फ कॉम्बैट ऑपरेशंस नहीं किए।
उन्होंने:
जैसे मुश्किल मिलिट्री कोर्स पूरे किए।
फिर 1994 में उन्होंने ब्रम्माह-II एक्सपेडिशन में हिस्सा लिया — जो सिर्फ माउंटेनियरिंग मिशन नहीं था। यह आर्म्ड मिलिट्री सर्वाइवल एक्सपेडिशन थी।
कल्पना कीजिए… हजारों फीट की ऊंचाई। ऑक्सीजन बेहद कम। फ्रीजिंग विंड्स। और साथ में कॉम्बैट इक्विपमेंट। ऐसी परिस्थितियों में शरीर से पहले दिमाग टूटता है। लेकिन वहीं स्पेशल फोर्सेस सोल्जर्स अलग साबित होते हैं।
1997 में मेजर सुधीर वालिया को स्पेशलाइज्ड मिलिट्री कोर्स के लिए यूनाइटेड स्टेट्स भेजा गया। वहां उन्होंने पेंटागन में भी संबोधन दिया।
बताया जाता है कि कोर्स में शामिल कई फॉरेन ऑफिसर्स उन्हें “कर्नल” कहकर बुलाते थे — क्योंकि उनकी टैक्टिकल अंडरस्टैंडिंग और लीडरशिप अलग स्तर की मानी जाती थी।
इंडियन आर्मी के भीतर उन्हें एक और नाम मिला था - “रैम्बो।” लेकिन यह निकनेम फिल्मों वाली एक्शन फैंटेसी की वजह से नहीं था। बल्कि इसलिए क्योंकि वह फिजिकली फियरलेस और ऑपरेशनल्ली रिलेंटलेस माने जाते थे।
1999... कारगिल सेक्टर में लड़ाई शुरू हो चुकी थी।
तब मेजर वालिया आर्मी चीफ जनरल वेद प्रकाश मलिक के एडीसी के रूप में पोस्टेड थे। वह रिलेटिवली सेफर अपॉइंटमेंट थी। लेकिन उन्होंने खुद रिक्वेस्ट लिखकर कारगिल जाने की अनुमति मांगी। यह डिसीजन बहुत कुछ बताता है।
कुछ ऑफिसर्स कमांड पोस्ट से वॉर देखते हैं। कुछ लोग सीधे बैटलफील्ड चुनते हैं।
जनरल मलिक ने उनकी रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली। और कुछ ही दिनों बाद मेजर वालिया मुश्कोह वैली सेक्टर में अपनी टीम लीड कर रहे थे।
कारगिल वॉर के दौरान उन्होंने मुश्कोह वैली में लगभग 5200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित जुलू टॉप कैप्चर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस एल्टीट्यूड पर सिर्फ चलना भी मुश्किल होता है। हेलिकॉप्टर सप्लाई रिस्की हो जाती है। ब्रीदिंग अनस्टेबल रहती है। टेम्परेचर्स ब्रूटल होते हैं।
लेकिन स्पेशल फोर्सेस मिशंस अक्सर वहीं भेजे जाते हैं जहां बाकी ट्रूप्स पहुंचना भी मुश्किल समझें।
29 अगस्त 1999...कारगिल वॉर तकनीकी रूप से खत्म हो चुका था।
लेकिन कश्मीर में काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशंस जारी थे। उस सुबह मेजर वालिया पांच सोल्जर्स की टीम लेकर कुपवाड़ा के हफरूदा फॉरेस्ट पहुंचे।
जंगल बेहद डेंस था। उन्होंने आवाजें सुनीं… लेकिन टार्गेट्स दिखाई नहीं दे रहे थे।
फिर उन्हें एक हिडन मिलिटेंट हाइडआउट दिखाई दिया। इसके बाद उन्होंने जो किया, वही उन्हें अमर बना गया। उन्होंने बिना हेजिटेशन हाइडआउट पर चार्ज किया। करीब 20 मिलिटेंट्स पैनिक में बाहर भागने लगे। मेजर वालिया ने बेहद करीब से फायरिंग करते हुए चार मिलिटेंट्स को मार गिराया। लेकिन इसी दौरान उनके चेहरे, सीने और बांह में गोलियां लगीं।
वह बुरी तरह घायल होकर गिर पड़े।
यहीं से यह कहानी ऑर्डिनरी ब्रेवरी से आगे निकल जाती है। मेजर वालिया मूव नहीं कर पा रहे थे।
खून लगातार बह रहा था। लेकिन उन्होंने रेडियो सेट पर अपने ट्रूप कमांडर्स को इंस्ट्रक्शंस देना जारी रखा।
उन्होंने कहा:
करीब 35 मिनट तक वह लगातार कम्युनिकेशन देते रहे।
और फिर…
उन्होंने उसी रेडियो सेट को पकड़े-पकड़े आखिरी सांस ली।
बैटलफील्ड में लीडरशिप का असली मतलब अक्सर रैंक नहीं होता। बल्कि वह क्षण होता है जब बाकी लोग पैनिक में हों… और कोई एक व्यक्ति पूरी लड़ाई को कंट्रोल में रखे।
मेजर सुधीर वालिया ने वही किया। उनकी वजह से मिलिटेंट्स एस्केप नहीं कर पाए। उनकी वजह से ऑपरेशन कोलैप्स नहीं हुआ। और शायद इसी वजह से आज भी स्पेशल फोर्सेस सर्कल्स में उनका नाम एक्स्ट्राऑर्डिनरी रिस्पेक्ट के साथ लिया जाता है।
क्योंकि मॉडर्न वॉरफेयर बदल चुका है। आज बैटल्स सिर्फ बॉर्डर्स पर नहीं लड़ी जातीं।
काउंटर इंसर्जेंसी, हाइब्रिड वॉरफेयर, कोवर्ट ऑपरेशंस, सर्विलांस मिशंस, ड्रोन इंटेलिजेंस — यही मॉडर्न कॉन्फ्लिक्ट का नया चेहरा है।
और ऐसे वॉरफेयर में स्पेशल फोर्सेस की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुकी है।
इंडियन आर्मी लगातार:
पर फोकस बढ़ा रही है।
मेजर सुधीर वालिया जैसे ऑफिसर्स उसी डॉक्ट्रिन की शुरुआती पहचान थे।
इंडियन आर्मी की कुछ कहानियां समय के साथ पुरानी नहीं होतीं। मेजर सुधीर कुमार वालिया की कहानी उन्हीं में से एक है। एक ऑफिसर… जिसने आखिरी पल तक कमांड नहीं छोड़ी।
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जय हिंद!
मेजर सुधीर कुमार वालिया इंडियन आर्मी की 9 पैरा एसएफ यूनिट के स्पेशल फोर्सेस ऑफिसर थे, जिन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
उनकी फियरलेस पर्सनैलिटी, एक्स्ट्रीम फिजिकल टफनेस और हाई-रिस्क ऑपरेशंस में एक्सेप्शनल परफॉर्मेंस के कारण उन्हें आर्मी सर्कल्स में “रैम्बो” कहा जाता था।
29 अगस्त 1999 को कुपवाड़ा के हफरूदा फॉरेस्ट ऑपरेशन में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद ट्रूप्स को लीड करने और मिलिटेंट्स को रोकने के लिए उन्हें अशोक चक्र दिया गया।
Parachute Regiment की 9 पैरा एसएफ इंडियन आर्मी की एलीट स्पेशल फोर्सेस बटालियन है, जो माउंटेन वॉरफेयर और काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशंस में विशेषज्ञ मानी जाती है।
हां। उन्होंने खुद रिक्वेस्ट करके फ्रंटलाइन पोस्टिंग ली थी और मुश्कोह वैली सेक्टर में ऑपरेशंस लीड किए थे।
यह ऑपरेशन जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा डिस्ट्रिक्ट के हफरूदा फॉरेस्ट एरिया में हुआ था।
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