जुलाई 1999।
द्रास की बर्फीली चोटियों पर रात का अंधेरा पसरा हुआ था।
तापमान शून्य से नीचे था। हवा इतनी तेज थी कि खड़े रहना भी मुश्किल था। लेकिन उस रात कुछ भारतीय सैनिक ऐसी चढ़ाई पर बढ़ रहे थे जिसे कई लोग लगभग असंभव मानते थे।
उनका लक्ष्य था: टाइगर हिल।
कारगिल युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कठिन लड़ाइयों में से एक।
यह केवल एक पहाड़ी नहीं थी।
यह वह ऊंचाई थी जहां से दुश्मन श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर नजर रख सकता था। यही सड़क लद्दाख और सियाचिन तक भारतीय सेना की जीवनरेखा थी।
अगर टाइगर हिल दुश्मन के कब्जे में रहती, तो कारगिल युद्ध का पूरा समीकरण बदल सकता था।
टाइगर हिल द्रास सेक्टर की सबसे प्रमुख चोटियों में से एक थी। इसकी ऊंचाई लगभग 16,500 फीट से अधिक थी और यहां से आसपास के क्षेत्र तथा Srinagar-Leh NH 1A पर स्पष्ट नजर रखी जा सकती थी।
1998-99 की सर्दियों के दौरान पाकिस्तानी घुसपैठियों और नियमित सैनिकों ने इस क्षेत्र पर कब्जा जमा लिया। ऊंचाई पर बैठे दुश्मन को बड़ा सामरिक लाभ मिला हुआ था। वह भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख सकता था और अपनी artillery को सटीक निर्देश दे सकता था।
यही कारण था कि टाइगर हिल को वापस लेना भारतीय सेना के लिए ज़रूरी बन गया था।
टोलोलिंग की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय सेना का ध्यान टाइगर हिल पर केंद्रित हुआ।
18 Grenadiers को इस मिशन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
उनके साथ 13 JAK Rifles और बाद में 8 Sikh की महत्वपूर्ण भूमिका भी जुड़ी।
भारतीय सेना जानती थी कि यह हमला सामान्य infantry assault नहीं होगा।
सैनिकों को लगभग सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़ते हुए दुश्मन के बंकरों तक पहुंचना था।
ऊपर दुश्मन था।
नीचे गहरी खाई।
बीच में बर्फ, पत्थर और मौत का खतरा।
जून 1999 के अंतिम सप्ताह में विस्तृत प्लानिंग शुरू हुई।
पिछली लड़ाइयों से मिले अनुभवों का विश्लेषण किया गया।
Bunker destruction drills, night movement training और assault rehearsals कराए गए।
हर अधिकारी और जवान को पता था कि टाइगर हिल पर सफलता केवल साहस से नहीं बल्कि सटीक planning से मिलेगी।
एक multi-directional attack plan तैयार किया गया।
योजना थी कि अलग-अलग दिशाओं से हमला करके दुश्मन को भ्रमित किया जाए और उसकी रक्षा व्यवस्था को तोड़ा जाए।
3 जुलाई की शाम भारतीय सैनिक आगे बढ़ने लगे।
मेजर आर. एस. राठौर की कंपनी ने Tongue क्षेत्र की ओर बढ़कर महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।
दूसरी ओर लेफ्टनंट बलवान सिंह के नेतृत्व में घातक पलटन दुश्मन की ओर बढ़ रही थी। यह लड़ाई जल्द ही hand-to-hand combat में बदल गई। कुछ स्थानों पर सैनिकों के बीच केवल कुछ मीटर की दूरी रह गई थी। हर पत्थर के पीछे मौत छिपी थी। हर कदम पर गोलीबारी हो रही थी।
फिर भी भारतीय सैनिक आगे बढ़ते रहे।
4 और 5 जुलाई की रात टाइगर हिल की ढलानों पर भीषण संघर्ष जारी रहा।
कप्तान सचिन निम्बालकर और घातक पलटन चुपचाप आगे बढ़े और शिखर के बेहद करीब पहुंच गए।
लेकिन दुश्मन ने जोरदार counter-attack शुरू कर दिया। स्थिति बेहद गंभीर हो गई। कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि पूरी कार्रवाई खतरे में पड़ सकती है।
यहीं सामने आए भारतीय सेना के कुछ सबसे बहादुर योद्धा।
गोलियों से घायल होने के बावजूद ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव पीछे नहीं हटे।
उन्होंने आगे बढ़कर दुश्मन की कई पोसिशन्स पर हमला किया। एक संगर तक पहुंचकर उन्होंने ग्रेनेड फेंका और अंदर घुसकर कई दुश्मन सैनिकों को मार गिराया।
इस दौरान उन्हें कई गोलियां लगीं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने महत्वपूर्ण जानकारी अपने साथियों तक पहुंचाने का प्रयास जारी रखा। उनकी यह असाधारण बहादुरी आगे चलकर Tiger Hill विजय की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में शामिल हुई।
इसी वीरता के लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार परम वीर चक्र प्रदान किया गया।
जब लड़ाई बेहद कठिन हो गई, तब 8 सिख को reinforcement के रूप में आगे बढ़ाया गया।
भारी गोलीबारी और लगातार हो रहे नुकसान के बावजूद जवानों ने अपनी पोसिशन नहीं छोड़ी। इसके बाद उन्होंने एक साहसी काउंटर अटैक किया। हेलमेट और रॉकी नॉब जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया गया। इस कार्रवाई का दुश्मन के मनोबल पर गहरा असर पड़ा। कई पाकिस्तानी सैनिक पीछे हटने लगे।
युद्ध का संतुलन अब तेजी से भारतीय सेना के पक्ष में झुक रहा था।
6 से 8 जुलाई के बीच भारतीय सेना ने क्रमशः Top, Tongue, Collar और आसपास की अन्य महत्वपूर्ण पोसिशन्स पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
विभिन्न दिशाओं से आगे बढ़ रही कम्पनीज़ आपस में जुड़ गईं। सुबह तक टाइगर हिल पूरी तरह भारतीय नियंत्रण में थी। कारगिल युद्ध की सबसे प्रतिष्ठित जीतों में से एक हासिल हो चुकी थी।
टाइगर हिल अब फिर से भारत के पास थी।
हर जीत की एक कीमत होती है।
टाइगर हिल की जीत भी बलिदानों से लिखी गई थी। कई भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। अनेक अधिकारी, JCOs और जवान घायल हुए।
लेकिन उनके साहस ने कारगिल युद्ध की दिशा बदल दी।
टाइगर हिल की लड़ाई केवल एक सैन्य जीत नहीं थी।
यह उन सैनिकों की कहानी है जिन्होंने 16,000 फीट से अधिक ऊंचाई पर, लगभग असंभव परिस्थितियों में, अपने साहस और संकल्प से इतिहास रच दिया।
कारगिल युद्ध की कई कहानियां हैं।
लेकिन टाइगर हिल आज भी उस जज्बे का प्रतीक है जो भारतीय सैनिक को दुनिया के सबसे कठिन युद्धक्षेत्रों में भी आगे बढ़ने की ताकत देता है।
यही कारण है कि टाइगर हिल केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि भारतीय सैन्य इतिहास का एक अमर अध्याय है।
FaujiBeats के साथ जुड़े रहें और भारतीय सैन्य इतिहास, वीरता पुरस्कारों, युद्धों और अनसुनी सैन्य कहानियों से जुड़ी ऐसी ही गहराई से शोध की गई और विश्वसनीय जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को फॉलो करते रहें।
जय हिन्द।
टाइगर हिल लद्दाख के द्रास सेक्टर में स्थित एक महत्वपूर्ण पर्वत चोटी है।
यह Srinagar-Leh Highway पर नजर रखने वाली प्रमुख ऊंचाई थी, जिससे दुश्मन artillery fire को निर्देशित कर सकता था।
भारतीय सेना की 18 Grenadiers, 8 Sikh और अन्य सहयोगी इकाइयों ने संयुक्त अभियान के माध्यम से टाइगर हिल को पुनः कब्जे में लिया।
उन्हें परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है।
मुख्य लड़ाई जुलाई 1999 के पहले सप्ताह में हुई और 8 जुलाई तक भारतीय सेना ने क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
Motivational
Motivational
Motivational